— प्रबंधन ने एक यूनियन को ऑफिस देने के बाद दो एन—4 बंगले की कर दी बंदरबाट
— अन्य यूनियनें नाराज, चल रहा है चर्चाओं का दौर
भोपाल।
प्रतिनिधि यूनियन के चुनाव के बाद भेल कर्मचारियों ने चार यूनियनों को अपने हितों की रक्षा करने के लिए चुना। जिनमें बीएमएस, एचएमएस, ऐबू और सीटू यूनियन शामिल है। इस चुनाव में इंटक यूनियन अपना जलवा नहीं दिखा सकी। पिछले दो सालों से कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने वाली इन यूनियनों में कुछ खास तो नहीं किया बल्कि यह आपस में ही टकराव की स्थिति में आई गईं, लिहाजा ऐबू, एचएमएस और सीटू यूनियन ने एक अलग ही संयुक्त मोर्चा बनाकर प्रबंधन के खिलाफ लामबंद होकर कर्मचारियों के हितों की लडाई लड़ने की ठान ली। इससे नंबर—वन यूनियन बीएमएस कुछ हद तक अलग—थलग पड़ गई।
इसके बाद से ही राजनीति का दौर शुरू हो गया। भेल संयुक्त मोर्चा में दो फाड़ कराने के लिए प्रबंधन ही नहीं बल्कि एक अन्य यूनियन भी पीछे पड़ गई। लाभ—शुभ की हदें तो तब पार गईं तब जब प्रबंधन ने एक यूनियन को पिपलानी फाउंड्री गेट के पास एक बड़ा ऑफिस भी अलाट कर दिया, लेकिन प्रबंधन की गोद में बैठने के बाद इस यूनियन ने दो एन—4 बंगले भी पिपलानी क्षेत्र में अलाट करा लिए। जबकि अन्य यूनियनों को महज एक ही ऑफिस दिया गया है। ऐसे में अन्य यूनियनों में आक्रोश व्याप्त है। सूत्र यह भी बताते हैं कि आखिर प्रबंधन की पालिसी फूट डालो राज करो काम आ ही गई।
दो फाड़ होने के बाद प्लांट कमेटी की बैठक में एक नंबर—वन यूनियन के साथ बैठी एक अन्य यूनियन अपने मकसद में कामयाब हो गई। अब वे कभी मोर्चा के साथ होने की बात करती है तो कभी नंबर—वन यूनियन के करीब बताती है। दूसरी ओर प्रबंधन ने फ़िर से एक यूनियन को पिपलानी सी सेक्टर में दो एन—4 यानि बंगला नंबर—7 व 8 आवंटित कर डाला। अपने खर्चों में कटौती की बात करने वाली बीएचईएल आर्थिक संकट के दौर से तो गुजर ही रही है उस पर एक यूनियन को दो—दो बंगले अलाट करना किसी के गले नहीं उतर रहा है। यह दोनों आवास खंडहर हो चुके हैं। लगभग 4 लाख रुपए से ज्यादा इन बंगलों को दुरुस्त करने में ही लग जाएगा।
आम कर्मचारियों के लिए बजट का रोना रोने वाली प्रबंधन इस यूनियन पर इतनी क्यों मेहरबान है कि उस पर चार लाख से ज्यादा रुपए खर्च करने पर तुली हुई है जबकि यूनियन को पहले ही एक ऑफिस दे रखा है। और मजेदार बात यह है कि इस ऑफिस पर भी प्रबंधन ने एक हजार फ़िट चेनलिन्स लगा डाली। वे भी लाखों रुपए खर्च कर। साफ जाहिर है कि भेल संयुक्त मोर्चे के दो फाड़ कराने के लिए प्रबंधन व एक यूनियन को काफी मेहनत करना पड़ी। खास बात यह है कि कर्मचारियों के हित की लड़ाई छोड़ और भेल संयुक्त मोर्चा में फाड़ इस यूनियन के लिए काफी महंगा पड़ेगा। अब इस यूनियन के कर्मचारी या पदाधिकारी धीरे—धीरे इस यूनियन को छोड़ने की तैयारी में लगे हैं। यह तो सबके समझ में आ गया है कि यह यूनियन कर्मचारियों की लड़ाई लड़ने के बजाए अपने हितों को साधने में प्रबंधन से हाथ मिलाने में लग गई है। इधर भेल प्रवक्ता का कहना है कि यूनियन की राजनीति से हमारा कोई वास्ता नहीं है। काम नियमानुसार किया गया।
