भोपाल
भेल जैसी नवरत्न कंपनी यूनिट भोपाल के अधिकारियों की अजीबों-गरीब दास्तां है । इस यूनिट में एक अनुमान के मुताबिक भेल में एक हजार अफसर और सात सौ सुपरवाइजर काम कर रहे हैं । इतने बड़े कारखाने का ज्ञान रखने वाले इन असफरों की मतदान में कोई रूचि नहीं है । बड़ी बात यह है कि सवा सौ करोड़ की बीएचईई थ्रिफ्ट एंड के्रडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी के खुद सदस्य होने के बाद चुनाव के समय मतदान में न के बराबर भाग लेते हैं ।
यही नहीं इस वर्ग के लोगों की करोड़ों की एफडी इस संस्था में ही जमा नहीं है बल्कि यहां से मिलने वाले हर तरह का लोन भी लेते हैं । जागरूकता की कमी के चलते थ्रिफ्ट के चुनाव में कुछ ऐसे लोग भी चुनकर पहुंच जाते हैं जिन्हें संस्था की वित्तीय स्थिति का ज्ञान तक नहींं है । इसके चलते कुछ ज्ञानी लोग ही संस्था को अपने ढंग से चलाते रहे हैं । कुछ सुपरवाइजर व आर्टिजन सदस्यों के वोट के आधार पर ही इस चुनाव का फैसला होता आया है ।
पिछले चुनाव की बात करें तो भेल के एक हजार अफसरों में से सिर्फ 148 ने ही मतदान में भाग लिया था इससे मतदान तो प्रभावित हुआ लेकिन अनुभवी अफसर व अन्य उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा इस बात को लेकर आज भी जब-जब थ्रिफ्ट चुनाव आता है तो कर्मचारी अधिकारियों के मतदान में शामिल न होने की बात करते नजर आता है । अधिकारियों और सुपरवाइजरों के लिये 13 नवंबर को होने वोल मतदान को लेकर कुछ इसी तरह की चर्चाऐं की जा रही हैं ।
दरअसल यह वर्ग इस चुनाव में इस वित्तीय संस्था को और आगे बढ़ाने के लिये मतदान में भाग ले तो काफी हद तक वित्तीय संकट से उबरा जा सकता है । यह बात इस वर्ग को सोचना होगा तब ही मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी मल्टी स्टेट संस्था को बचाया जा सकता है । आज भी इसको लेकर भेल में यह कहा जा रहा है कि जो अफसर-सुपरवाइजर भेल जैसी नवरत्न कंपनी को अपने अनुभव से बेहतर परफारमेंस के दम पर नंबर वन बनाये हुये हैं क्या वे अपनी ही संस्था थ्रिफ्ट को अपने अनुभव के आधार पर मतदान कर आगे नहीं बढ़ा सकते यह बड़ा सवाल है ।
