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बीएचएल का संघर्ष और उपेक्षित निष्ठा: महेश मालवीय के 51 वर्षों की तपस्या

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भोपाल

राजनीति में अक्सर शोर मचाने वालों को जगह मिल जाती है, लेकिन वैचारिक निष्ठा और शालीनता के साथ काम करने वाले व्यक्तित्व नेपथ्य में ही रह जाते हैं। आदरणीय महेश मालवीय जी और बीएचएल (BHEL) परिवार का संघर्ष इसी ‘मौन तपस्या’ का जीवंत उदाहरण है। 51 वर्षों का सार्वजनिक जीवन, जिसमें पद की लालसा से ऊपर संगठन का हित रहा, आज एक विशेष विमर्श की मांग करता है। पार्षद की ‘लक्ष्मण रेखा’ और राजनैतिक संकीर्णता बीएचएल क्षेत्र की सबसे बड़ी राजनैतिक विडंबना यह रही है कि यहाँ के नेतृत्व को हमेशा ‘पार्षद’ के पद तक सीमित कर दिया गया। जिस नेतृत्व के पास हजारों श्रमिकों को एकजुट रखने और उनके हक की लड़ाई लड़ने का दशकों का अनुभव हो, उन्हें विधानसभा या राज्यसभा जैसे उच्च सदनों के योग्य न समझना दोनों ही प्रमुख दलों—कांग्रेस और भाजपा—की एक बड़ी भूल है। यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे श्रमिक वर्ग की उपेक्षा है जिसने लोकतंत्र को सदैव मजबूती दी।

विचारधारा के प्रति अटूट प्रेम महेश मालवीय जी की निष्ठा का प्रमाण यह है कि निर्दलीय चुनाव जीतने के बावजूद उन्होंने बिना शर्त कांग्रेस को अपना समर्थन दिया। पांच दशकों के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कभी भी अपने संगठन या कार्यकर्ता की सार्वजनिक आलोचना नहीं की। वे ‘सबको साथ लेकर चलने’ की उस लुप्त होती राजनीति के रक्षक हैं, जहाँ मर्यादा और अनुशासन सर्वोपरि है। जाति-धर्म नहीं, केवल ‘श्रम का सम्मान’ बीएचएल की धरती ने हमेशा एक ही धर्म सिखाया है—’श्रम का सम्मान’। मालवीय और उनके साथियों ने कभी भी जाति या धर्म के नाम पर वोट या पद नहीं मांगा। उनकी मांगें हमेशा स्पष्ट रहीं: मैनेजमेंट से: श्रमिकों की सुरक्षा और हक। पार्टी से: समर्पित कार्यकर्ताओं का आत्म-सम्मान। सरकार से: श्रमिक परिवारों के बच्चों का उज्ज्वल भविष्य। न्याय का समय: राज्यसभा की दहलीज तक आज जब राजनीति में शुचिता और अनुभव की कमी महसूस की जा रही है, तब महेश मालवीय जैसे व्यक्तित्व की उच्च सदन (राज्यसभा) में उपस्थिति अनिवार्य जान पड़ती है। ऐसे मर्यादित और अनुभवी नेता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना न केवल बीएचएल का गौरव बढ़ाएगा, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं में विश्वास जगाएगा जो निस्वार्थ भाव से संगठन की सेवा करते हैं।

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