भोपाल। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी मिसाल पेश करते हुए पहली बार ‘एबीओ-इनकम्पैटिबल’ (ABO-Incompatible) यानी अलग ब्लड ग्रुप के बीच सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया है। इस जटिल ऑपरेशन में एक 47 वर्षीय पिता (ब्लड ग्रुप एबी पॉजिटिव) ने अपने 22 वर्षीय बेटे (ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव) को किडनी दान कर उसे नया जीवन प्रदान किया। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में होने वाले कुल जीवित डोनर किडनी प्रत्यारोपणों में इस तरह के मामले मात्र 5 से 10 प्रतिशत ही होते हैं।
सामान्यतः अलग ब्लड ग्रुप होने पर शरीर नई किडनी को स्वीकार नहीं करता और उसे ‘रिजेक्ट’ कर देता है, लेकिन एम्स के डॉक्टरों ने आधुनिक तकनीक और विशेष उपचार पद्धति का उपयोग कर इस जोखिम को सफलतापूर्वक पार किया। यह सफलता उन मरीजों के लिए एक नई उम्मीद है, जिन्हें परिवार में मैचिंग ब्लड ग्रुप का डोनर न मिलने के कारण लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता था। यह एम्स भोपाल में किया गया 20वां सफल किडनी ट्रांसप्लांट है।
इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी को नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी, एनेस्थीसिया और ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया। टीम में डॉ. महेंद्र अटलानी, डॉ. देवाशीष कौशल, डॉ. केतन मेहरा और डॉ. कुमार माधवन जैसे विशेषज्ञ शामिल थे। संस्थान के कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ डॉ. माधवानंद कर और चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विकास गुप्ता ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर पूरी टीम को बधाई देते हुए इसे संस्थान की बढ़ती दक्षता और टीमवर्क का शानदार परिणाम बताया है।
