भोपाल। केंद्र सरकार द्वारा 8वें वेतन आयोग के गठन की तैयारियों के बीच इसके ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ ( को लेकर देश भर के पेंशनरों और कर्मचारी संगठनों में चिंता और आक्रोश की स्थिति निर्मित हो रही है। पेंशनर्स फेडरेशन ने आयोग के संदर्भों में जोड़ी गई एक नई तकनीकी पंक्ति पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संगठनों का आरोप है कि इस नए प्रावधान के जरिए भविष्य में पुरानी व गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं पर संकट खड़ा हो सकता है।
कर्मचारी संगठनों के अनुसार, इस बार वेतन आयोग के नियमों में (गैर-अंशदायी पेंशन योजना की बिना फंड वाली लागत) वाक्य को जोड़ा गया है। इस पर सवाल उठाते हुए फेडरेशन के पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार पुरानी पेंशन को ‘अनफंडेड’ यानी बिना वित्तीय बैकअप वाली देनदारी के रूप में क्यों देख रही है, जबकि इसके लिए लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का फंड मौजूद होने की बात कही जाती रही है। कर्मचारियों को अंदेशा है कि इस परिभाषा के सहारे भविष्य में पेंशन लाभों में कटौती या तार्किक बदलाव के नाम पर सख्ती की जा सकती है। चर्चाओं के केंद्र में “वित्त विधेयक 2025” के कुछ संभावित प्रावधान भी हैं। कर्मचारी हलकों में यह आशंका जताई जा रही है कि नए नियमों के प्रभाव से पेंशनभोगी 8वें वेतन आयोग से जुड़े वित्तीय विवादों को लेकर आसानी से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकेंगे।
इसके अलावा, वर्ष 1983 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले के कमजोर होने का डर भी सता रहा है, जिसमें शीर्ष अदालत ने स्पष्ट माना था कि ‘पेंशन कोई खैरात या इनाम नहीं, बल्कि कर्मचारी का सामाजिक-आर्थिक हक है।’ पेंशनर्स फेडरेशन और विभिन्न केंद्रीय कर्मचारी संगठनों ने सरकार के इन कदमों के खिलाफ विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न विभागीय स्तरों पर कर्मचारियों और रिटायर्ड कर्मियों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। संगठनों का कहना है कि बुढ़ापे के एकमात्र सहारे (पेंशन) पर किसी भी तरह का अप्रत्यक्ष आघात स्वीकार नहीं किया जाएगा और यदि आवश्यक हुआ, तो इसके खिलाफ वैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
