भोपाल। राजधानी के प्रतिष्ठित जयप्रकाश (जेपी) जिला अस्पताल में मुफ्त इलाज और मुफ्त दवाओं का सरकारी दावा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है। अस्पताल में आने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों को पर्चे पर लिखी करीब 40 प्रतिशत दवाएं बाहर के निजी मेडिकल स्टोर या जन औषधि केंद्रों से महंगी कीमतों पर खरीदनी पड़ रही हैं।
बदहाली का आलम यह है कि खुद डॉक्टर भी मरीजों को पहले ही आगाह कर देते हैं कि जरूरी दवाएं अंदर काउंटर पर नहीं मिलेंगी। जब मीडिया ने खुद मरीज बनकर अस्पताल के दवा काउंटर की पड़ताल की, तो फार्मासिस्ट ने बेबसी जताते हुए कहा कि दवाएं स्टॉक में नहीं हैं। सेंट्रल स्टोर को इंडेंट (मांग पत्र) भेजा गया है, लेकिन वे कब तक आएंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अस्पताल की यह किल्लत सिर्फ मरीजों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का मेडिकल स्टाफ भी इस अव्यवस्था की मार झेल रहा है। ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और इंटर्न्स को इलाज के दौरान संक्रमण से बचने के लिए मास्क और ग्लव्स जैसी बेहद बुनियादी चीजें भी जेपी अस्पताल के बाहर स्थित जन औषधि केंद्र से खुद की जेब से पैसे देकर खरीदनी पड़ रही हैं।
जन औषधि केंद्र के संचालक ने बातचीत में बताया कि पिछले तीन सालों से अस्पताल में कभी भी शत-प्रतिशत दवाओं का स्टॉक पूरा नहीं रहा। सरकार से बजट आने के बावजूद जमीनी स्तर पर डॉक्टरों और मरीजों को बुनियादी सुविधाएं न मिलना स्वास्थ्य विभाग के दावों और प्रबंधन पर बड़े भ्रष्टाचार व लापरवाही के गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस पूरी मिसमैनेजमेंट का सबसे दर्दनाक असर उन गरीब मरीजों पर पड़ रहा है जो सुबह जल्दी उठकर दूर-दराज से इस उम्मीद में आते हैं कि उनका इलाज मुफ्त हो जाएगा। काउंटर पर दवा न मिलने की स्थिति में मरीजों के पास दो ही रास्ते बचते हैं—या तो वे कर्ज लेकर बाहर से दवा खरीदें, या फिर दवा बदलवाने के लिए दोबारा डॉक्टर के कक्ष के बाहर लंबी लाइनों में खड़े हों। रोजाना 1200 से 1500 मरीजों की ओपीडी वाले इस अस्पताल में दवाएं न मिलने के कारण डॉक्टरों पर ‘री-विजिट’ (मरीजों का दोबारा आना) का भार बढ़ गया है, जिससे डॉक्टरों को हर दिन 2000 से ज्यादा मरीजों को देखना पड़ रहा है। इससे न सिर्फ मरीजों का समय और पैसा बर्बाद हो रहा है, बल्कि अत्यधिक काम के बोझ के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी लगातार गिरती जा रही है।
