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नाकाम होती जा रही है बीजेपी की ‘विभीषण पॉलिटिक्स’, चंपाई सोरेन से कुछ हांसिल न हुआ

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नई दिल्ली,

कितना अजीब है न. लोकसभा चुनाव में झारखंड के मुकाबले महाराष्ट्र में बीजेपी का प्रदर्शन खराब होता है, लेकिन कुछ ही दिन बाद विधानसभा चुनाव में नतीजे अलग आते हैं. जैसे महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करके एकनाथ शिंदे बीजेपी के साथ आ गये थे, झारखंड में भी हेमंत सोरेन को छोड़कर चंपाई सोरेन बीजेपी के हो गये थे. दोनो मामलों में एक महत्वपूर्ण फर्क नंबर का जरूर था. नंबर की ही बदौलत एकनाथ शिंदे फिर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार बने हुए हैं.

चंपाई सोरेन सोरेन तो झारखंड में फेल हो गये, लेकिन दिल्ली में कैलाश गहलोत का टेस्ट अभी बाकी है. दिल्ली में भी जल्दी ही चुनाव होने वाले हैं, और उससे पहले ही अरविंद केजरीवाल का साथ छोड़ कर कैलाश गहलोत बीजेपी में पहुंच गये हैं.

अब तक का रिकॉर्ड तो यही बता रहा है कि चंपाई सोरेन की तरह जितने भी नेता अपनी पार्टियां छोड़कर बीजेपी के साथ आये फेल ही साबित हुए. माइथॉलजी के हिसाब से देखें तो ऐसे नेता जो बीजेपी के साथ आकर अपनी ही पुरानी पार्टी के खिलाफ हथियार बनते हैं, विभीषण जैसे ही लगते हैं.

1. चंपाई सोरेन तो बिलकुल नहीं चले
चंपाई सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री तब बने थे, जब हेमंत सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. चंपाई सोरेन ने अलग से तो कुछ नहीं किया लेकिन झारखंड के लोगों को ये महसूस नहीं होने दिया कि हेमंत सोरेन के जेल चले जाने से सरकारी कामकाज पर कोई फर्क पड़ा है.

अव्वल तो जेल जाने से पहले हेमंत सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन विरोध के कारण हाथ पीछे खींचने पड़े. चीजें चल रही थीं, और चुनाव की तारीख भी नजदीक आती जा रही थी, लेकिन हेमंत सोरेन को जमानत नहीं मिल रही थी – लेकिन, एक दिन हाई कोर्ट ने हेमंत सोरेन की जमानत मंजूर करते हुए जेल से रिहा करने का आदेश जारी कर दिया.

जेल से छूटते ही हेमंत सोरेन ने सबसे पहले चंपाई सोरेन से अपनी कुर्सी वापस मांग ली, और आनन फानन में मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली. चंपाई सोरेन ने नाराजगी जताई, और नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया. दिल्ली का दौरा किया, और बीजेपी नेताओं से मिले. लौटने के बाद चंपाई सोरेन ने इरादा बदल दिया, और फिर भगवा धारण कर लिया.

बीजेपी को चंपाई सोरेन से झारखंड के कोल्हान क्षेत्र को लेकर काफी उम्मीदें थीं, लेकिन नतीजे आये तो काफी निराश होना पड़ा. चंपाई सोरेन बिलकुल नहीं चले. विभीषण कैटेगरी का बीजेपी का लेटेस्ट एक्सपेरिमेंट था.

2. जीतनराम मांझी तो फिसड्डी साबित हुए थे
लोकसभा चुनाव 2014 में जेडीयू की हार के बाद नीतीश कुमार ने अपने कैबिनेट साथी जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था. लेकिन, 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले वो मांझी को हटाकर फिर से मुख्यमंत्री बन गये.

चुनावों के पहले से ही जीतनराम मांझी ने नीतीश कुमार के खिलाफ जंग छेड़ दी थी, और बीजेपी का भी उनको खूब सपोर्ट मिल रहा था. बीजेपी ने जीतनराम मांझी के जरिये नीतीश कुमार को डैमेज करने की कोशिशों में कोई कसर बाकी नहीं रखी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. लालू यादव से हाथ मिलाकर चुनाव मैदान में उतरे नीतीश कुमार ने बीजेपी को बड़े आराम से शिकस्त दे दी थी. थक हार कर मांझी फिर से नीतीश कुमार के साथ आ गये, और अब तो एनडीए में शामिल होने की वजह से केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री जरूर बन गये हैं.

3. शुभेंदु अधिकारी ने ममता को हराया, लेकिन मिशन अधूरा रहा
जब बीजेपी को लगा कि मुकुल रॉय की मदद से वो तृणमूल कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाई, तो उसने ममता बनर्जी के एक और करीबी शुभेंदु अधिकारी पर पासा फेंका, और अपने पाले में ले लिया – लेकिन जो सोचकर साथ लिया गया था, बीजेपी को वैसा कोई फायदा नहीं मिला.

भले ही शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को शिकस्त दे दी, लेकिन टीएमसी को पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने से नहीं रोक पाये – और लोकसभा चुनाव 2024 में भी शुभेंदु अधिकारी कोई करिश्मा नहीं दिखा सके. बीजेपी को 2019 से भी कम सीटें मिली थीं.

4. अब कैलाश गहलोत की परीक्षा?
विभीषण कैटेगरी के नेताओं में नया नाम दिल्ली से आया है. कैलाश गहलोत ने हाल ही में आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है. और, अभी से वो अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हमले शुरू कर चुके हैं – चुनावों में क्या कर पाते हैं, ये देखना अभी बाकी है.

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