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‘नए सिरे से तय हो जाति व्यवस्था…’, फिजूल की PIL पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, वकील पर 50 हजार जुर्माना

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नई दिल्ली

जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सीधे हायर जुडिशरी से गुहार लगाने के लिए 41 वर्ष पहले जनहित याचिका यानी ‘पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन’ (PIL) की शुरुआत की गई थी। कोई भी व्यक्ति जनहित से जुड़े मुद्दे पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर सकता है। लेकिन आज आलम ये है कि सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल की बाढ़ आ गई है। राफेल डील हो या यूनिफॉर्म सिविल कोड, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की बात हो या किसी शहर का नाम बदलना, मुद्दा कोई भी हो, सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल हो जा रही है। मंगलवार को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने फिजूल के मुद्दों पर पीआईएल दाखिल करने की टेंडेंसी पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए एक वकील पर 50 हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया।

बात-बेबात पीआईएल दाखिल करने के चलन पर सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी कई मौकों पर नाराजगी जता चुका है। कुछ जाने-माने ऐक्टिविस्ट-वकील और प्रचार के भूखे एडवोकेट पीआईएल दाखिल करते रहते हैं जिससे सुप्रीम कोर्ट का वो कीमती वक्त जाया होता है। उस वक्त का इस्तेमाल पांच साल से पेंडिंग चल रहे 60-70 हजार केसों को कम करने में हो सकता है।

मंगलवार को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने एक वकील की तरफ से दायर 2 जनहित याचिकाओं पर काफी कड़ा रुख अपनाया। एक पीआईएल में वकील ने ‘केंद्र सरकार को जाति व्यवस्था को नए सिरे से तय करने, फिर से वर्गीकरण करने के लिए पॉलिसी बनाने’ का निर्देश देने की मांग की थी। दूसरी पीआईएल में वकील ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सरकारी नौकरियों में ‘रिजर्वेशन पॉलिसी को धीरे-धीरे खत्म करने’ का निर्देश देने की मांग की थी।

सीजेआई की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि दोनों ही याचिकाएं ‘पीआईएल के दुरुपयोग के स्पष्ट उदाहरण’ हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए वकील पर दोनों मामलों में 25-25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

फाइल इयर के लॉ स्टूडेंट की तरफ से पीआईएल दाखिल करने का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। सीजेआई की अगुआई वाली बेंच के ही सामने ऐसी ही एक पीआईएल में एक लॉ स्टूडेंट ने मांग की थी कि ‘चेयरमैन’ शब्द को ‘चेयरपर्सन’ से रीप्लेस करने के लिए केंद्र सरकार को संविधान संशोधन बिल लाने का निर्देश दिया जाए। उसकी दलील थी कि ‘चेयरमैन’ शब्द से लैंगिक भेदभाव झलकता है। इस पर बेंच ने स्टूडेंट को पढ़ाई पर फोकस करने और ऐसी फिजूल की पीआईएल को बनाने और फाइल करने में वक्त बर्बाद नहीं करने की नसीहत दी।

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