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भारत का पानी रोक कर रेगिस्तान को हरा-भरा बना रहा चीन! 10 साल में 53% बंजर भूमि पर उगाए पेड़

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बीजिंग

17 जून को पूरी दुनिया में विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य भूमि का क्षरण रोकने, उन्हें बंजर से हरियाली में बदलने और सूखे की समस्या से निजात पाने के लिए किया जाता है। इसी दिन चीन ने ऐलान किया है कि उसने पिछले 10 साल में अपनी कुल बंजर भूमि के 53 फीसदी हिस्से को हरा-भरा बना दिया है। यह कोई छोटा-मोटा इलाका नहीं, बल्कि 2 करोड़ 33 लाख हेक्टेयर है। इस उपलब्धि का ऐलान चीन के राष्ट्रीय वानिकी और घास के मैदान प्रशासन ने शनिवार को की है। हालांकि, चीन के इस उपलब्धि के पीछे का काला सच यह है कि उसने यह कारनामा दूसरे देशों के हिस्से के पानी पर डाका डालकर किया है। चीन ने अपनी भूमि से पड़ोसी देशों को बहने वाली कई नदियों पर गैरकानूनी रूप से बांध बनाए हैं। जिससे उन नदियों का प्रवाह पड़ोसी देशों में या तो धीमा हो गया है या फिर रुक गया है।

ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाकर भारत का पानी रोक रहा चीन
चीन ने भारत की ओर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी पर भी एक नया बांध बनाया है। इस बांध में इकट्ठा होने वाले पानी का इस्तेमाल चीन तिब्बत और दूसरे राज्यों में सिंचाई के लिए कर रहा है। इस बांध का निर्माण अरुणाचल प्रदेश की सीमा के काफई नजदीक किया जा रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध को चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना बना रही है। चीन में ब्रह्मपुत्र नदी को यारलुंग ज़ान्गबो के नाम से जाना जाता है। इसे नवीन ‘पंचवर्षीय योजना’ (अवधि 2021-2025) के हिस्से के रूप में बनाया जा रहा है। 2015 में चीन ने तिब्बत के जान्ग्मु में अपनी पहले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को शुरू किया था। तब भी भारत ने अपनी चिंता जताई थी। अब इस नए बांध से ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह पर काफी असर पड़ने का अनुमान है।

चीन ने ऐसे रोका रेगिस्तान का विस्तार
चीन का दावा है कि वह दुनिया में मरुस्थलीकरण से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। 1998 में चीन के राष्ट्रीय वानिकी और ग्रासलैंड प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, चीन के पास लगभग 2.62 मिलियन वर्ग किलोमीटर मरुस्थलीकरण भूमि थी, जो देश के कुल भूमि क्षेत्र का 27.4 प्रतिशत थी। 1970 के दशक के बाद से चीन ने थ्री-नॉर्थ शेल्टरबेल्ट फॉरेस्ट प्रोग्राम, बीजिंग-तियानजिन सैंडस्टॉर्म सोर्स कंट्रोल प्रोजेक्ट और मिट्टी के कटाव के नियंत्रण जैसी कई पारिस्थितिक परियोजनाएँ शुरू की हैं। इसका मुख्य उद्देश्य हरे-भरे क्षेत्रों को बढ़ाना और मरुस्थलीकरण के रफ्तार को कम करना है।

38000 वर्ग किमी इलाका हरा-भरा हुआ
चीनी सरकारी मीडिया सीजीटीएन की रिपोर्ट के अनुसार, दशकों के प्रयास के बाद मरुस्थलीकरण से निपटने के कार्य के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। 2019 तक चीन में 2 करोड़ 57 लाख वर्ग किलोमीटर मरुस्थलीकरण भूमि थी, जो 2014 की तुलना में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर कम है। मरुस्थलीकरण भूमि का क्षेत्र पिछली सदी के अंत में 10,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक के औसत वार्षिक विस्तार से बदल गया है। चीन के उत्तर पश्चिमी झिंजियांग उइगुर स्वायत्त क्षेत्र में स्थित टकलामकान रेगिस्तान चीन का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। अपने कठोर वातावरण के कारण इसे “मृत्यु का सागर” के रूप में जाना जाता है।

टकलामकान रेगिस्तान में बनाई पेड़ों की दीवार
20वीं शताब्दी की शुरुआत में, चीन ने टकलामकान रेगिस्तान क्षेत्र में मरुस्थलीकरण नियंत्रण पर काम शुरू किया। स्थानीय लोगों और वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों से मरुस्थलीकरण के खिलाफ संघर्ष किया है। रेगिस्तान में बनी 565 किलोमीटर लंबी सड़क के दोनों किनारों पर 2 करोड़ से अधिक पेड़ लगाए गए हैं। सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों के अनुसार, 2020 की तुलना में 2022 में रेगिस्तान का दक्षिणी किनारा अधिक पौधों के रोपण के कारण हरा-भरा हो गया है।

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