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‘सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार, बिना घूस नहीं बढ़ती फाइलें’, कर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

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बेंगलुरू

कर्नाटक हाई कोर्ट ने सरकारी दफ्तरों को लेकर सख्त टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि आजकल सरकारी कार्यालयों में कोई भी फाइल बिना रिश्वत के नहीं चलती है। मामला बेंगलुरू विकास प्राधिकरण (बीडीए) से जुड़ा था। बीडीए के एक सहायक अभियंता को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया था। हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की और इंजिनियर को जमानत देने से इनकार कर दिया।

एंटी करप्शन ब्यूरो पुलिस ने 59 वर्षीय केटी राजू को 7 जून 2022 को गिरफ्तार किया था। उसके पास 5 लाख रुपये कैश बरामद हुए थे। आरोप है कि इंजिनियर ने कथित तौर पर भूमि-पार्सल मामले में शिकायतकर्ता मंजूनाथ के पक्ष में अग्रिम के रूप में धन प्राप्त किया था।

जमीन की लटकाई फाइल
मंजूनाथ को सुवलाल जैन और सुरेश चंद जैन का जीपीए धारक कहा जाता है, जिनके पास केंगेरी में 33-गुंटा जमीन है। जमीन का उपयोग बीडीए ने अधिग्रहण की कार्यवाही किए बिना सड़क बनाने के लिए किया था।

60 लाख घूस हुई थी तय
राजू की याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति के नटराजन ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता के पक्ष में आदेश पारित करने के लिए एक करोड़ रुपये की मांग की। सौदेबाजी के बाद, वह कथित तौर पर काम पूरा करने के लिए 60 लाख रुपये लेने के लिए तैयार हो गया। शिकायतकर्ता से पांच लाख रुपये एडवांस लेते समय एसीबी ने उसे फंसा लिया।

फोन की रिकॉर्डिंग की पेश
एसीबी ने इस मामल में एक टेलीफोन की बातचीत पेश की। सबूत पेश किए। पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने एसीबी के निशान लगे नोट लिए थे। न्यायाधीश ने कहा, ‘आजकल, सरकारी कार्यालयों में, भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है और बिना रिश्वत के कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती है। मेरा विचार है कि याचिकाकर्ता इस स्तर पर जमानत का हकदार नहीं है।’

इंजिनियर ने कहा फंसाया जा रहा
राजू ने कहा था कि उन्हें फंसाया गया है। उन्होंने दावा किया कि मूल भूमि मालिकों ने वैकल्पिक भूमि की मांग के लिए एक आवेदन दायर किया था और इसे वापस ले लिया था। इसलिए, अभियोजन पक्ष ने उसके खिलाफ रिश्वत की मांग और स्वीकृति का आधार नहीं बनाया है। उनके वकील ने कहा था, ‘मात्र राशि की स्वीकृति याचिकाकर्ता के रिश्वत की मांग और स्वीकार का आधार नहीं हो सकती।’ एसीबी के वकील ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के बाद फाइल आगे बढी। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि उसने छह महीने तक कोई आदेश पारित नहीं किया था क्योंकि वह उसे रिश्वत नहीं मिली थी।

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