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दिल्ली: जिस रामलीला मैदान से जन्मी AAP, मुश्किल में घिरे तो वहीं से ताकत बटोर रहे हैं केजरीवाल

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नई दिल्ली,

केंद्र के अध्यादेश के खिलाफ आम आदमी पार्टी रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान से हुंकार भर रही है. ये वही मैदान है, जहां से इस पार्टी का साल 2012 में सियासी तौर पर जन्म हुआ था. अब जब, पार्टी को फिर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और देशभर की राजनीति पार्टियों का समर्थन मांगना पड़ रहा है तब पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने मेगा रैली आयोजित कर अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए बड़ा दांव चला है. इस मेगा रैली में एक लाख की भीड़ जुटाने का दावा किया है.

यही वजह है कि दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने रैली के लिए दिन भी रविवार का चुना है और लोगों को रैली में आने का निमंत्रण दिया है. 12 साल बाद एक बार फिर रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन भी चर्चा में आ गया है. रविवार को AAP इस रैली को केजरीवाल के अलावा, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, दिल्ली सरकार में मंत्री सौरभ भारद्वाज, आतिशी और राज्यसभा सांसद संजय सिंह समेत अन्य टॉप लीडर्स संबोधित करेंगे.

‘कपिल सिब्बल भी AAP को समर्थन देने पहुंचे’
खास बात यह है कि इस रैली में सपा के समर्थन से राज्यसभा भेजे गए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल भी शामिल होने पहुंचे हैं. कपिल का नाम कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार रहा है. केजरीवाल और AAP नेता लगातार कांग्रेस की खिंचाई करते आए हैं. साल 2011 में खुद केजरीवाल ने इसी रामलीला मैदान में तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार और उनके नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोला था. अन्ना आंदोलन में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. इस बार निशाने पर केंद्र की बीजेपी सरकार है.

‘AAP को 10 साल में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल…’
बता दें कि अक्टूबर 2012 में अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाने का ऐलान किया था. उसके बाद 26 नवंबर 2012 को AAP की लॉन्चिंग की गई. इस पार्टी के गठन को 10 साल से ज्यादा वक्त हो गया है. इतने कम समय में पार्टी की दिल्ली और पंजाब में सरकार है. गोवा और गुजरात विधानसभा में पार्टी के कई विधायक हैं और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी हासिल कर लिया है.

क्या है AAP की देश में पॉजिशन…
AAP के देशभर में कुल 161 विधायक हैं. इनमें से दिल्ली में 62, पंजाब में 92, गोवा में 2 और गुजरात में 5 विधायक हैं. राज्यसभा में पार्टी के 10 सांसद हैं. लोकसभा में फिलहाल कोई सदस्य नहीं है. दिल्ली नगर निगम चुनाव में AAP ने 250 में से 134 वार्ड में जीत हासिल की है. पार्टी के पास मेयर और डिप्टी मेयर हैं.

‘कैसे अस्तित्व में आई AAP?’
6 अप्रैल 2011. दिल्ली का रामलीला मैदान. किशन बापट बापूराव उर्फ अन्ना हजारे ने जन लोकपाल कानून के लिए पहला अनशन किया था. अन्ना की ये दिल्ली में पहली दस्तक थी. इतनी जोरदार कि सत्ता के गलियारे तक हिलते नजर आए. अन्ना हजारे के समर्थन में पूरे देश में जगह-जगह आंदोलन शुरू हो गए. अन्ना हजारे के साथ खड़ी भीड़ में एक चेहरा अरविंद केजरीवाल का भी था. केजरीवाल को उस समय अन्ना का ‘अर्जुन’ भी माना जाता था. क्योंकि अन्ना के बाद वही दूसरे ऐसे शख्स थे जिन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. भूख हड़तालें हुईं. लेकिन इन सबके बावजूद जन लोकपाल कानून नहीं बन पाया.

‘2012 में AAP की लॉन्चिंग’
फिर 2 अक्टूबर 2012 को अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया. तमाम नेताओं ने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए आंदोलन का इस्तेमाल किया. हालांकि, केजरीवाल और उनके सहयोगियों का कहना था कि देश को भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाने का यही तरीका है कि वो राजनीति में जाएं और सिस्टम में घुसकर गंदगी को साफ करें. 26 नवंबर 2012 को ‘आम आदमी पार्टी’ नाम से राजनीतिक पार्टी लॉन्च कर दी. अन्ना हजारे भी इसके पक्ष में नहीं थे. उस समय अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ‘सभी पार्टियों ने धोखा दिया है. सभी पार्टियां पर्दे के पीछे से एक-दूसरे की मदद करती हैं. जब तक राजनीति नहीं बदलेगी तब तक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती. इसलिए हमने मजबूरी में आम आदमी पार्टी का गठन किया है.’

अब मुश्किल में क्यों है AAP, विरोध के क्या कारण हैं?
आम आदमी पार्टी को इस मुश्किलों में घिरा माना जा रहा है. चूंकि पार्टी के सीनियर लीडर्स मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन समेत अन्य दिग्गज जेल में बंद हैं. शराब घोटाले में बड़े नेताओं के नाम से पार्टी को डिफेंस मोड में देखा जा रहा है. हाल ही में बंगला विवाद ने नई मुश्किल खड़ी कर दी है. उसके बाद ट्रांसफर-पोस्टिंग अधिकार भी नए अध्यादेश के आने से छिन गए हैं.

‘सिसोदिया शराब घोटाले में जेल में बंद’
बताते चलें कि मनीष सिसोदिया को दिल्ली शराब घोटाले में आरोपी बनाया गया है. जबकि सत्येंद्र जैन मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस में सालभर से ज्यादा समय से बंद हैं. पार्टी के अन्य नेताओं को भी जमानत नहीं मिल रही है. इस बीच, दिल्ली सरकार को ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट से अधिकार मिले तो केंद्र इसे लेकर अध्यादेश ले आई. ये अध्यादेश 6 महीने के अंदर संसद में पेश होगा. अगर विपक्ष का साथ नहीं मिला तो ये बिल आसानी से पास हो जाएगा और AAP को राजनीतिक रूप से बड़ी हार मिलेगी.

‘देशभर में समर्थन मांग रहे हैं केजरीवाल’
यही वजह है कि AAP प्रमुख केजरीवाल लगातार देशभर की विपक्षी पार्टियों के नेताओं से समर्थन मांग रहे हैं और संसद में इस अध्यादेश का विरोध करने की मांग कर रहे हैं. अब तक उन्होंने बिहार के सीएम नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, एमके स्टालिन, केसीआर समेत अन्य पार्टी प्रमुखों से बात की है. हालांकि, उन्होंने अब तक उनकी कांग्रेस नेताओं से मुलाकात और बात नहीं हुई है.

’49 दिन में कांग्रेस से टूट गया था सियासी रिश्ता’
बता दें कि दिल्ली में जब AAP की 2013 में पहली बार सरकार बनी थी तब इस सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. हालांकि, यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला था. 49 दिन बाद ही AAP और कांग्रेस का सियासी रिश्ता टूट गया था.

‘अध्यादेश के खिलाफ AAP ने चलाया अभियान’
इससे पहले शनिवार को AAP की प्रवक्ता रीना गुप्ता ने बताया कि रैली में एक लाख लोग शामिल हो सकते हैं. AAP ने लोगों को अध्यादेश और उनके दैनिक जीवन पर इसके प्रभाव के बारे में बताने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया है. लोगों तक पहुंचे हैं. अगर दिल्ली के अधिकारी मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे तो दिल्ली सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं को केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा, दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को तीन बार चुना है.

‘AAP के दावे पर बीजेपी ने किया पलटवार’
गुप्ता ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी कहा गया है कि अगर नौकरशाह उनकी (दिल्ली सीएम) बात नहीं सुनेंगे तो एक चुनी हुई सरकार कैसे काम करेगी. दिल्ली के लोग परेशान हैं कि केंद्र इसे बदलने की कोशिश क्यों कर रहा है. वहीं, बीजेपी नेता गौतम गंभीर ने आरोप लगाया कि दिल्ली ने पिछले 9 वर्षों में ‘कोई विकास कार्य नहीं’ देखा है. उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार सिर्फ ‘करदाताओं से दूसरे राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए पैसा इकट्ठा कर रही है.’ उन्होंने आरोप लगाया, ‘इन नौ सालों में उन्होंने (अरविंद केजरीवाल) दिल्ली में क्या विकास किया?’

बता दें कि केंद्र सरकार ने 19 मई को राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण नाम से अध्यादेश जारी किया है. ये ऑर्डिनेंस सेवाओं से संबंधित मामलों पर कार्यकारी नियंत्रण को अपने डोमेन में वापस लाता है. इससे पहले 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले दिया था, जिसमें दिल्ली सरकार को दिल्ली के अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग समेत सेवा से संबंधित मामलों पर कार्यकारी नियंत्रण दिया गया था. पुलिस, भूमि और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित अधिकार एलजी के पास ही रखे गए थे.

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