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‘आरएसएस की कठपुतली केजरीवाल’ एक आंदोलन से कैसे बन गए दिल्ली की सत्ता के सरताज

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नई दिल्ली

‘2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जब शुरू हुआ तो सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दो मोहरे थे। बाद में केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार कर पूरे आंदोलन पर कब्जा जमा लिया और दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली।’ कांग्रेस जोर-शोर से ये आरोप लगाती रही है। पार्टी यह भी कहती है कि केजरीवाल आरएसएस की कठपुतली हैं। अब भाजपा भी केजरीवाल के सरकारी आवास ‘शीशमहल’ पर आक्रामक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मुद्दा बनाकर दिल्ली चुनाव को एक दिलचस्प मोड़ दे दिया। दिल्ली विधानसभा चुनावों का ऐलान होने के साथ चुनावी सरगर्मी और तेज हो जाएगी। जानते हैं एक आंदोलन ने कैसे किसी को दिल्ली को सरताज बना दिया।

कांग्रेस सरकार के विरोध में खड़ा हुआ था आंदोलन
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ था। यह आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान कई भ्रष्टाचार घोटालों के उजागर होने के बाद शुरू हुआ था। प्रदर्शनकारियों ने देश में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और मुकदमा चलाने के लिए जन लोकपाल विधेयक (नागरिक लोकपाल विधेयक) की मांग की थी। हालांकि, 18 दिसंबर, 2013 को संसद से पारित होने के बाद जन लोकपाल विधेयक लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के रूप में कानून बन गया। इसे 1 जनवरी, 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 16 जनवरी को लागू हुआ।

अन्ना ने शुरू किया आमरण अनशन, देशभर में समर्थन
2011 में 4 अप्रैल को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जनलोकपाल बिल लाने की मांग को लेकर दिल्ली में आमरण अनशन शुरू कर दिया। सरकार ने उनकी मांग मानते हुए अनशन के पांचवें दिन यानी 9 अप्रैल को अधिसूचना जारी की, जिसके बाद अन्ना ने एक छोटी बच्ची के हाथों नींबू पानी पीकर अपना अनशन तोड़ा। मगर, 15 अगस्त तक विधेयक पास नहीं हुआ तो 16 अगस्त को अन्ना दोबारा अनशन पर बैठे। इसके बाद देशभर में अन्ना के समर्थन में आंदोलन शुरू हो गए। आखिरकार सरकार को आनन-फानन में इस बिल को लोकसभा में लाना पड़ा। लोकसभा में बिल पास होने के बाद अन्ना का आंदोलन खत्म हुआ।

आंदोलन से जुड़े नामचीन लोगों ने बनाई आम आदमी पार्टी
उस वक्त अन्ना के आंदोलन को किरण बेदी, कुमार विश्वास, अनुपम खेर, जनरल वीके सिंह, योगेंद्र यादव जैसी हस्तियों ने समर्थन दिया। अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह, शाजिया इल्मी जैसे कई लोग इस आंदोलन के बाद हीरो बन गए। अन्ना अपने आंदोलन को राजनीतिक लोगों से दूर रखते थे। अन्ना के साथ इस आंदोलन में शामिल कई लोग इसी आंदोलन से नेता बन गए। इन लोगों ने मिलकर आम आदमी पार्टी बनाई। केजरीवाल इसके संयोजक बने। 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद हुए प्रदर्शनों में लोगों की सहानुभूति को आप ने बटोरा।

आंदोलन का सबसे ज्यादा फायदा केजरीवाल को मिला
हालांकि, आम आदमी पार्टी जल्द ही बिखर गई। इससे जुड़े कई लोग दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए, तो कुछ ने राजनीति से किनारा कर लिया। केजरीवाल से मतभेदों के चलते कई लोगों को इस पार्टी का साथ छोड़ना पड़ा। मगर, पूरे आंदोलन से सबसे ज्यादा फायदा केजरीवाल को हुआ। इस आंदोलन से नेता बने केजरीवाल को दिल्ली ने तीन बार अपनी गद्दी पर बैठाया।

दावा-राजनीतिक भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बनाई पार्टी
केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को भारतीय संविधान को अपनाने की सालगिरह पर AAP की स्थापना की थी। यह दावा किया गया कि यह नई पार्टी दूसरों से इस मायने में अलग थी कि केजरीवाल न तो किसी मौजूदा पार्टी से राजनीतिक रूप से जुड़े थे और न ही किसी स्थापित राजनीतिक नेता से संबंधित थे। AAP का नेतृत्व इस बात पर जोर देता है कि पार्टी का अस्तित्व भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लोकप्रिय आंदोलन से निकला है। अक्सर पार्टी को ऐसे लोगों का समूह बताया है जो राजनीति में प्रवेश करने के लिए अनिच्छुक हैं लेकिन उनके पास राजनीतिक भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कोई अन्य रास्ता नहीं है।

दावा पड़ा झूठा: शराब से जुड़े ठेके में धांधली के आरोप
AAP का प्रतीक झाड़ू भ्रष्टाचार को समाप्त करने की पार्टी की मंशा से जुड़ी है, मगर आप सरकार का नाम शराब के ठेके से जुड़े घोटाले में भी आया। खुद केजरीवाल को जेल तक जाना पड़ा। प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च, 2024 को केजरीवाल को कथित भ्रष्टाचार के लिए गिरफ्तार किया था। उन्हें 13 सितंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी थी और जेल से निकलने के कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। AAP नेता आतिशी को अगले विधानसभा चुनाव तक उनके उत्तराधिकारी के रूप में घोषित किया गया है।

राहुल बोले-यूपीए सरकार गिराने को आरएसएस ने खड़ी की आप
2020 में आप के संस्थापक सदस्य रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि 2014 में भाजपा सरकार के सत्ता में आने से पहले 2011 में देश में जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ था, उसे बीजेपी और आरएसएस का समर्थन प्राप्त था। इस पर राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा-लोकतंत्र को खत्म करने और यूपीए सरकार को गिराने के लिए इंडिया अगेंस्ट करप्शन और आम आदमी पार्टी को आरएसएस और बीजेपी ने खड़ा किया। वहीं, स्वराज इंडिया पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने भी कहा था कि अरविंद चतुर निकले और उनकी राजनीति बीजेपी-आरएसएस के करीब की ही है। हम उन्हें तब नहीं समझ पाए और जब समझा तो साथ छोड़ दिया।

आरएसएस के एजेंट हैं केजरीवाल: कांग्रेस
हाल ही में केजरीवाल की ओर से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को लिखी चिट्ठी पर दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने आड़े हाथ लिया। नई दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित ने कहा-केजरीवाल ने आरएसएस को पत्र क्यों लिखा है? पत्र तो उनको लिखा जाता है जिनसे सीधा रिश्ता होता है। आप ने ही कहा था कि आपके पिता का आरएसएस से संबंध था। इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में भी इनकी आरएसएस से सीधे-सीधे दोस्ती थी। दरअसल, केजरीवाल देर सबेर अपनी असलियत जाहिर कर देते हैं। हम जो कहते हैं कि केजरीवाल आरएसएस के एजेंट है वह उनसे बाहर आ ही जाता है।

आम आदमी पार्टी दिल्ली की जीत को सबकुछ समझ बैठी। वह उसी राजनीति में लोटने लगी जिसे बदलने का मैंडेट लोगों ने दिया था। आप इस मामले में भटक गई।
आशुतोष, वरिष्ठ पत्रकार

जब पत्रकार आशुतोष को भी केजरीवाल ने नहीं बख्शा
चर्चित पत्रकार आशुतोष ने अन्ना आंदोलन को लेकर एक किताब लिखी थी-अन्ना क्रांति। उन्होंने उस दौर में भारत को बदल देने वाले 13 दिनों की घटनाओं कीसीधी जानकारी इसमें दी है। आशुतोष खुद उस दौर में अनशन स्थल, दिल्ली के रामलीला मैदान में उपस्थित थे और दोनों पक्षों केंद्र की यूपीए सरकार और टीम अन्ना के साथ सीधे संपर्क में थे। अन्ना हजारे के आंदोलन की मानसिकता को समझाने के लिए आशुतोष ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और महात्मा गांधी के सत्याग्रह को याद करते हुए स्वतंत्रता पूर्व के भारत की राजनीति की भी पड़ताल की है। उन्हें भी केजरीवाल की बेरुखी का सामना करना पड़ा और आप से बाहर होना पड़ा।

आप का कैसा रहा था बीते दो विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन
आप ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया है। 2015 में AAP ने 70 में से 67 सीटें जीतीं और 54.6% वोट हासिल किए। वहीं, 2020 में पार्टी को 62 सीटें मिलीं और वोट शेयर थोड़ा कम होकर 53.6% रह गया। 2013 में 32 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी बीजेपी की 2015 के चुनाव में सीटें घटकर केवल तीन रह गईं। वहीं, 2020 में वह 8 सीटें जीतने में कामयाब रही। कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले कुछ चुनावों में लगातार खराब रहा है। 2008 में 43 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2013 में 24.6% वोट शेयर के साथ 8 सीटों पर सिमट गई। 2015 और 2020 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। केजरीवाल की रातनीति को लेकर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी टिप्पणी की थी।

इस बार के दिल्ली दंगल में क्या मुकाबले में है कांग्रेस
2020 के चुनावों में कांग्रेस ने 66 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसके 3 उम्मीदवारों को 20,000 से अधिक वोट मिले। जबकि 5 को 10,001 से 20,000 के बीच वोट मिले। 20 उम्मीदवारों को 5,001 से 10,000 वोट मिले, जबकि 38 उम्मीदवार 5,000 से कम वोटों पर सिमट गए। ऐसे में इस बार दिल्ली में नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव से आप की शुरुआत
2013 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव आप ने पहली बार लड़ा। कुल 70 सीटों में बीजेपी को 33.07 फीसदी वोट शेयर के साथ 31 सीटें मिलीं। वहीं, आम आदमी पार्टी को 29.49 फीसदी वोट शेयर के साथ 28 सीटें हासिल हुईं। जबकि, 24.55 फीसदी वोट शेयर के साथ कांगेस महज 8 सीटें ही जीत पाई।

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