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मैं नहीं मानता- राष्ट्रीय भावना बढ़ाने के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी- यूसीसी पर RSS के गुरु गोलवलकर ने दी थी दो टूक राय

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नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर बहस छिड़ गई है। यूनिफॉर्म सिविल कोड ऐसा मसला है, जो लंबे वक्त से बीजेपी के चुनावी एजेंडे में शामिल रहा है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दिल के भी करीब है। हालांकि आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर इसके खिलाफ थे। उन्होंने अंग्रेजी अखबार ‘मदरलैंड’ के संपादक केआर मलकानी से 23 अगस्त 1972 को दिल्ली में हुई बातचीत में समान नागरिक संहिता पर विस्तार से अपनी बात रखी थी। इसका ब्योरा ‘श्री गुरुजी समग्र’ के नौवें खंड मिलता है, जो गोलवलकर के पत्रों, साक्षात्कारों और बातचीत का संकलन है।

UCC पर एमएस गोलवलकर की राय
गुरु गोलवलकर से केआर मलकानी सवाल करते हैं कि क्या आप राष्ट्रीय भावना को बढ़ाने के लिए समान नागरिक संहिता को आवश्यक नहीं मानते? इस पर गुरु गोलवलकर कहते हैं- मैं बिल्कुल नहीं मानता। इससे आपको या बहुतों को आश्चर्य हो सकता है, परंतु मेरा मानना है कि जो सत्य मुझे दिखाई देता है वह मुझे कहना ही चाहिए। इस पर मलकानी पूछते हैं कि क्या आप नहीं मानते कि देश में एकरूपता जरूरी है? जवाब में गोलवलकर कहते हैं- समरसता और एकरूपता दो अलग-अलग बातें हैं। एकरूपता जरूरी नहीं है। भारत में हमेशा से विविधताएं हैं और एकता के लिए एकरूपता नहीं, बल्कि समरसता आवश्यक है।

संविधान में कहा गया है कि राज्य समान नागरिक संहिता के लिए प्रयत्न करेगा? इसके जवाब में गुरु गोलवलकर कहते हैं, ‘यह ठीक है। ऐसा नहीं है कि समान नागरिक संहिता से मेरा कोई विरोध है। लेकिन संविधान में कोई बात है इसका मतलब यह नहीं है कि वह अनिवार्य बन जाती है। फिर यह भी है कि भारत का संविधान कई विदेशी संविधान के जोड़-तोड़ से बना है। यह न तो भारतीय जीवन के दृष्टिकोण से बना है और न ही उस पर आधारित है’।

मुस्लिमों के विरोध पर नजरिया
मलकानी, गुरु गोलवलकर से सवाल करते हैं कि क्या आपको लगता है कि मुसलमान समान नागरिक संहिता का विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह अपना अलग अस्तित्व बनाए रखना चाहते हैं?

इस पर गोलवलकर कहते हैं कि किसी वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय द्वारा अपना अस्तित्व बनाए रखने से मेरा तब तक कोई झगड़ा नहीं है जब तक इस प्रकार का अस्तित्व राष्ट्रभक्ति की भावना से दूर हटने का कारण नहीं बने। मेरे मत से कुछ लोग समान नागरिक संहिता की आवश्यकता इसलिए महसूस करते हैं कि उनके विचार में मुसलमानों को चार शादियां करने का अधिकार है और इसी के चलते उनकी आबादी में असंतुलित वृद्धि हो रही है। लेकिन मुझे डर है कि समस्या के प्रति सोचने का यह दृष्टिकोण ठीक नहीं है। वास्तविक समस्या तो यह है कि हिंदू और मुसलमानों के बीच भाईचारा नहीं है। धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले लोग भी मुसलमानों को अलग नजरिये से देखते हैं।

गोलवलकर आगे कहते हैं कि जब तक मुसलमान इस देश को, यहां की संस्कृति से प्यार करते हैं… उनका अपनी जीवन पद्धति के अनुसार चलना स्वागत योग्य है। मेरा निश्चित मत है कि मुसलमानों को राजनीति खेलने वालों ने खराब किया है। कांग्रेस है, जिसने केरल में मुस्लिम लीग को पुनर्जीवित कर देश भर में मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। मलकानी, गोलवलकर से आग सवाल करते हैं, ‘क्या इन्हीं तर्क के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता है कि हिंदू कोड बिल का निर्माण भी अनावश्यक और अवांछनीय था?’

‘हिंदू कोड बिल भी अनावश्यक’
इस पर गुरु गोलवलकर जवाब देते हैं, ‘मैं निश्चित रूप से मानता हूं कि हिंदू कोड बिल राष्ट्रीय एकता और एकसूत्रता की दृष्टि से पूर्णत: अनावश्यक है। सालों से अपने यहां अनेक संहिताएं रही हैं, लेकिन उनकी वजह से कोई नुकसान नहीं हुआ है। अभी अभी तक केरल में मातृसत्तात्मक पद्धति थी, उसमें कौन सी बुराई थी? स्थानीय रीति-रिवाजों या संहिताओं को सभी समाज द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।

फिर समान दंड विधान क्यों जरूरी?
समान नागरिक संहिता जरूरी नहीं है तो फिर समान दंड विधान की क्या आवश्यकता है? इस सवाल पर गुरु गोलवलकर कहते हैं कि दोनों में अंतर है। नागरिक संहिता का संबंध व्यक्ति एवं उसके परिवार से है। जबकि दंड विधान का संबंध न्याय व्यवस्था तथा अन्य बातों से है। उसका संबंध न केवल व्यक्ति से बल्कि वृहद रूप से समाज से भी संबंधित है।

मुस्लिमों में बहुविवाह पर राय
मलकानी पूछते हैं कि क्या मुस्लिम बहनों को पर्दे में बनाए रखना और बहुविवाह का शिकार होने देना योग्य है? इस पर गुरु गोलवलकर कहते हैं कि मुस्लिम प्रथाओं के प्रति आपकी आपत्ति यदि मानवीय कल्याण पर आधारित है तो यह उचित है। ऐसे मामलों में सुधारवादी दृष्टिकोण ठीक ही है। परंतु यांत्रिक ढंग से कानून के द्वारा सबको समान लाने का दृष्टिकोण रखना ठीक नहीं होगा। मुसलमान स्वयं ही अपने पुराने नियम-कानूनों में सुधार करें। यदि वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि बहुविवाह प्रथा उनके लिए ठीक नहीं है, तो मुझे प्रसन्नता होगी। लेकिन मेरा मानना है कि मैं अपना मत उन पर लादना नहीं चाहता।

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