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बात घुसपैठियों की तो उदाहरण व्यभिचार का क्यों? जज के कॉमेंट जान कहेंगे- वाह! क्या बात कही

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जेबी पारदीवाला ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A को असंवैधानिक और अप्रासंगिक करार दिया। उन्होंने संविधान पीठ के चार साथी जजों की राय से असहमति जताते हुए अपने पक्ष में कई दलीलें दीं। हालांकि, चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली कंस्टिट्यूशन बेंच ने 4:1 के फैसले से धारा 6ए को संवैधानिक करार दिया।

जस्टिस पारदीवाला की राय बाकी जजों से अलग
अपने अलग फैसले में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि सिटिजनशिप एक्ट के सेक्शन 6ए समय के साथ असंवैधानिक हो गया है, भले ही 1985 में लागू करते समय यह संवैधानिक रही हो। जस्टिस पारदीवाला ने ‘समय की तात्कालिक असंगति’ के सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि कोई कानून जो पहले उचित और मान्य था, वह समय के साथ मनमाना हो सकता है। उन्होंने यह उदाहरण दिया कि कैसे आंध्र प्रदेश के भवनों के नियंत्रण अधिनियम में एक प्रावधान ने समय के साथ असंगति का रूप ले लिया। इस संदर्भ में, उन्होंने बताया कि अगर कोई वर्गीकरण अब अपने उद्देश्य से जुड़ा नहीं है, तो वह मनमाना और भेदभावपूर्ण हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उदाहरण देकर रखा अपना पक्ष
अपनी दलीलों में ही जस्टिस पारदीवाल ने ‘जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ’ मामले का संदर्भ भी दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। इस मामले में यह कहा गया था कि प्रावधान केवल पुरुषों के लिए है और महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करता है। न्यायालय ने पाया कि यहां कोई तर्कसंगत मानदंड नहीं था और यह वर्गीकरण लिंग भेदभाव से भरा हुआ था।

न्यायमूर्ति पारदीवाला की राय अस्थायी अनुचितता के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहती है कि भले ही धारा 6ए(3) 1985 में अपने अधिनियमन के समय संवैधानिक थी, लेकिन समय बीतने के साथ यह असंवैधानिक हो गई है क्योंकि यह प्रावधान समस्या का समाधान करने के लिए पर्याप्त प्रभावी नहीं रहा है। न्यायिक समीक्षा के स्थापित सिद्धांतों में से एक यह है कि कोई कानून जो लागू किए जाने के वक्त उचित और वैध था, समय बीतने के साथ मनमाना हो सकता है।

जस्टिस पारदीवाला ने इसे समझाने के लिए मोटर जनरल ट्रेडर्स बनाम आंध्र प्रदेश राज्य का उदाहरण दिया। इसमें आंध्र प्रदेश भवन (लीज, किराया और बेदखली) नियंत्रण अधिनियम 1960 की धारा 32(बी) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसने 26 अगस्त, 1957 को या उसके बाद निर्मित सभी भवनों को अधिनियम के दायरे से छूट दी थी। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर प्रावधान को चुनौती दी कि यह समय बीतने के साथ अनुचित हो गया है। इस तर्क को इसी कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने स्वीकार कर लिया। तत्कालीन विद्वान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ईएस वेंकटरमैया ने पीठ के लिए लिखते बताया था कि गैर-भेदभावपूर्ण प्रावधान बीतते समय के साथ भेदभावपूर्ण और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला बन सकता है।

व्यभिचार के कानून में बदलाव का जिक्र
इसी क्रम में जस्टिस पारदीवाला ने व्यभिचार के मामले की भी बात की। उन्होंने कहा, ‘जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 497 की संवैधानिक वैधता को अनुच्छेद 14 और 15 के उल्लंघन के आधार पर चुनौती दी गई थी। धारा 497 में व्यभिचार के अपराध को इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि जब कोई व्यक्ति किसी महिला के साथ यह जानते हुए भी संभोग करता है कि वह किसी की पत्नी है और संभोग करने के लिए उसके पति से सहमति नहीं लेता है तो वह व्यक्ति व्यभिचार का अपराधी है।’

उन्होंने बताया कि आगे चलकर यह कैसे असंगत साबित हो गया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, ‘एक तर्क यह था कि यह प्रावधान कम समावेशी था क्योंकि यह केवल उस स्थिति से निपटता था जहां एक पुरुष ने पति की सहमति के बिना एक विवाहित महिला के साथ यौन संबंध बनाए थे, लेकिन इसके विपरीत नहीं। यानी एक महिला ने पुरुष की पत्नी की सहमति के बिना विवाहित पुरुष के साथ यौन संबंध बनाए, तब उसके किए को अपराध नहीं माना गया।’

जब सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस भेदभाव के खिलाफ आकर्षित किया गया तो संविधान पीठ ने समीक्षा के हाई स्टैंडर्ड के अनुरूप प्रावधान का परीक्षण किया। फिर इसी कोर्ट ने माना कि वर्गीकरण के लिए कोई तर्कसंगत पैमाना नहीं था और यह पैमाना लैंगिक रूढ़ियों में डूबा हुआ था जहां एक महिला की सहमति लेने की कोई जरूरत ही नहीं समझी गई। जस्टिस पारदीवाला ने कहा, ‘मेरी सहमति वाली राय में मैंने नोट किया कि धारा 497 के साथ समस्या केवल इसका ‘कम समावेशी होना’ नहीं था, बल्कि इस कारण महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले हीन दर्जे की हो गईं।’

जस्टिस पारदीवाला की टिप्पणियां बेहद अहम
फिर जस्टिस पारदीवाला ने स्पष्ट किया कि धारा 6ए की असंवैधानिकता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या यह अब अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर रही है या नहीं। यदि कोई प्रावधान समय के साथ उचित नहीं रहता, तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। उनका यह विचार भारतीय न्यायिक प्रणाली की गहराई और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

क्या है सेक्शन 6ए का मामला, समझिए
असम में घुसे बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिकता देने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन करके धारा 6ए का विशेष प्रावधान किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और बांग्लादेशियों की आवक का विरोध अभियानों का नेतृत्व कर रहे असम के छात्र संगठनों के बीच 15 अगस्त, 1985 को एक समझौता हुआ था। उसी समझौते के तहत नागरिकता अधिनियम में धारा 6ए जोड़कर असम आए बांग्लादेशियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया में छूट का प्रावधान किया गया। हालांकि, इस प्रावधान में वर्णित नियमों का पालन नहीं हो सका और आज असम बांग्लादेशी घुसपैठियों से पैदा कई तरह के खतरों से जूझ रहा है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए की वैधानिकता को चुनौती दी गई।

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