नई दिल्ली:
दिल्ली में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी दलों के बीच खींचतान जारी है। मुकाबले में बीजेपी, आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस है। इस बीच कांग्रेस के बड़े नेता ने आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल की जीत की भविष्यवाणी करके सबको चौंका दिया है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने दिल्ली के आगामी चुनावों को लेकर कहा, ‘दिल्ली के चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं और शायद अरविंद केजरीवाल फिर से चुनाव जीत जाएंगे। कांग्रेस भी चुनाव में हिस्सा लेगी, लेकिन कांग्रेस और उनकी पार्टी के बीच गठबंधन की संभावना अब कम लग रही है। हालांकि, दिल्ली के चुनावों के बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है।’
चव्हाण ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ के बारे में हमारे पास कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन इतना तय है कि यह पारदर्शी नहीं हैं। चुनाव आयोग को ईवीएम की बजाय फिर से पेपर बैलेट का इस्तेमाल करना चाहिए। क्योंकि पेपर बैलेट वेरीफिएबल है और उसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।
चुनाव आयोग की कार्यशैली पर उठाए सवाल
उन्होंने कहा, ‘ईवीएम लंबे समय से चुनावों में इस्तेमाल हो रही है, लेकिन हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है। चुनाव आयोग का मुख्य कार्य निष्पक्ष चुनाव कराना है, और चुनाव आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि चुनावों की प्रक्रिया ऐसी हो, जिसमें जनता का पूरा विश्वास हो। लेकिन आज स्थिति ऐसी हो गई है कि लोगों का चुनाव प्रक्रिया पर विश्वास नहीं रहा है। कई लोगों ने विभिन्न मुद्दों पर आपत्ति जताई है और कुछ ने तो याचिका भी दायर की है। ऐसे में चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।’
‘नए मतदाता आखिरी मिनट में जोड़े गए’
पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा, ‘इसका मुख्य कारण यह है कि चुनावी प्रक्रिया में कई सारी खामियां देखने को मिली हैं। खासतौर पर जिस तरह से नए मतदाता आखिरी मिनट में जोड़े गए, उनकी कोई जांच नहीं हुई, न ही कोई डोर-टू-डोर वेरिफिकेशन हुआ और ऑब्जेक्शन उठाने का भी पर्याप्त समय नहीं दिया गया। इन मुद्दों ने चुनाव प्रक्रिया पर संदेह पैदा किया है। अब सवाल यह उठता है कि क्या ईवीएम में कोई घपला हो सकता है या नहीं? मेरे विचार से, अभी तक हमें कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं कि ईवीएम में कोई घपला हुआ है। इसका यह मतलब नहीं है कि ईवीएम पूरी तरह से सही है और उसमें कोई गड़बड़ी नहीं हो सकती।
‘पक्का प्रमाण हमारे पास नहीं है’
उन्होंने कहा, ‘हम सबूत की तलाश में हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई पक्का प्रमाण हमारे पास नहीं है। हालांकि, एक बात साफ है कि ईवीएम की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। यह प्रक्रिया बहुत जटिल और तकनीकी है, जिसे आम आदमी पूरी तरह से समझ नहीं पाता। इसलिए हमारी मांग है कि चुनाव आयोग को ईवीएम की बजाय फिर से पेपर बैलेट का इस्तेमाल करना चाहिए। क्योंकि पेपर बैलट वेरीफिएबल है और उसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। पेपर बैलेट को 10 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है और उसका सत्यापन भी किया जा सकता है।’
‘ईवीएम और वीवीपैट सिस्टम में जो पर्चियां…’
उन्होंने आगे कहा, ‘ईवीएम और वीवीपैट सिस्टम में जो पर्चियां निकलती हैं, वे थर्मल पेपर होती हैं, जो कुछ महीने बाद फीकी पड़ जाती हैं और उनकी स्याही उड़ जाती है। इसका मतलब यह है कि उन पर्चियों से कोई ठोस प्रमाण नहीं बचता। लोग यह महसूस करते हैं कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। जब तक लोगों को पूरी तरह विश्वास न हो जाए, तब तक यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं मानी जा सकती।’
‘…जर्मनी में फिर से पेपर बैलेट का इस्तेमाल शुरू’
उन्होंने कहा, ‘अगर हम अंतरराष्ट्रीय उदाहरण लें, तो जर्मनी में 2005 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल हुआ था। लेकिन कुछ साल बाद जर्मनी के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि वहां की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रक्रिया असंवैधानिक है। इसके बाद, 2009 के बाद जर्मनी में फिर से पेपर बैलेट का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। यह उदाहरण यह साबित करता है कि विश्व स्तर पर भी ईवीएम के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं।’
चुनाव आयोग से की ये मांग
उन्होंने कहा, ‘हमारी मांग है कि चुनाव आयोग ईवीएम को विपक्षी दलों, विशेषज्ञों और हैकर्स को उपलब्ध कराए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें कोई गड़बड़ी या हैकिंग की संभावना तो नहीं है। जब तक ईवीएम की पूरी प्रक्रिया, उसका सर्किट डायग्राम, चिप कोड और अन्य तकनीकी जानकारी विशेषज्ञों के पास नहीं होगी, तब तक यह कहना मुश्किल है कि क्या इसमें कोई गड़बड़ी हो सकती है या नहीं। इसलिए हमारी यह विशेष मांग है कि आगामी चुनावों में पेपर बैलेट का इस्तेमाल किया जाए। इससे लोगों को विश्वास होगा क्योंकि पेपर बैलट में किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना कम होती है और यह सत्यापित किया जा सकता है। लोग जब तक पूरी तरह से ईवीएम की प्रक्रिया पर विश्वास नहीं करेंगे, तब तक यह चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हो सकती।’
