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सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे! ‘चीनी कंपनियों के लिए अमेरिका की तरह भारत भी करे यह काम’

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नई दिल्ली

चीन की कंपनियों का कई क्षेत्रों में दबदबा है। भारत इन सेक्टरों में चीनी कंपनियों की मदद से अपने आर्थिक विकास को और तेज रफ्तार दे सकता है। अमेरिका ने इसके लिए एक रणनीति अपना रखी है। यह रणनीति ऐसी ही है जैसे ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’। भारत भी अमेरिका की तरह चीनी कंपनीयाें के लिए ये रणनीति अपना सकता है। इससे भारत का काफी फायदा होगा। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में जाने माने अर्थशास्त्री स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर का एक लेख छपा है। इसमें अमेरिका की इसी रणनीति के बारे में उन्होंने बताया है। स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर के मुताबिक, भारत और अमेरिका इस समय चीन पर एक ही तरह की दुविधा का सामना कर रहे हैं।

दोनों ही देश उन सेक्टरों में टेक्नोलॉजी और इनवेस्टमेंट से लाभान्वित हो सकते हैं, जहां पर चीन की कंपनियां सबसे आगे हैं। लेकिन समस्या ये है कि चीन सुरक्षा संबंधी खतरे पैदा करता है। इसका समाधान किया जाना जरूरी है। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन और ट्रेजरी सचिव जेनेट येलेन ने इस समस्या का एक हल निकाला है। यह है ‘हाई फेंस, स्मॉल यार्ड’ यानी छोटे क्षेत्रों में ज्यादा कड़ी निगरानी। अमेरिका की तरह भारत को भी इसी तरह के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए।

यह रणनीति कहती है कि पहले तो यह तय करें कि ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहां पर कड़ी निगरानी की जरूरत है। इसके बाद इन क्षेत्रों में ऊंची बाड़ लगा दो। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों में सीधे प्रतिबंध का ऐलान या फिर मंजूरी देने से पहले कड़ी जांच की जाए। लेकिन इस तरह से बहुत अधिक चीनी प्रोडक्ट्स या कंपनियों पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं है।

प्रगतिशीन अर्थव्यवस्था
चीन अब बहुत ही प्रगतिशील अर्थव्यवस्था है। कई सेक्टर में चीनी कंपनियां और टेक्नॉलजी बेस्ट हैं। जेनेट येलेन ने बार-बार जोर दिया है कि इन सभी सेक्टर में चीन को बाहर रखना बहुत बड़ी ग़लती होगी। अमेरिका के सबसे बड़ी व्यापारिक साझेदारों में से एक है चीन। डॉनल्ड ट्रंप के समय लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है। अगर व्यापक पैमाने पर व्यापार पर प्रतिबंध लगाया गया, तो अमेरिकी ग्राहक सस्ते कंज्यूमर प्रोडक्ट से वंचित हो जाएंगे। इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा ग़रीब लोगों पर। अमेरिका इसके चलते क्लाइमेट चेंज से लड़ने के लिए ज़रूरी चीज़ों – सोलर मॉड्यूल और पैनल, सबसे अडवांस्ड बैटरियों, सस्ते इलेक्ट्रिक वीकल्स और सबसे बेहतर 5जी टेलिकॉम उपकरणों से भी वंचित हो जाएगा।

सुरक्षा को देखते हुए उठाया ये कदम
इधर भारत और अमेरिका, दोनों ने सुरक्षा पर ख़तरे को देखते हुए चीनी 5जी पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन, जेनेट येलेन का कहना है कि व्यापक पैमाने पर चीन से अलग होने का मतलब होगा अमेरिका के कई प्रोडक्ट का बड़े चीनी बाज़ार तक ना पहुंच पाना। अमेरिका फिर निर्यात का मौका खो देगा। यह दोनों देशों के लिए भयानक होगा। इसका उपाय यही है कि ट्रेड और इन्वेस्टमेंट को जोखिम मुक्त किया जाए, ना कि मुंह मोड़ लिया जाए। इसी के लिए जरूरी है ‘हाई फेंस, स्मॉल यार्ड’। अमेरिका अपनी कंपनियों को सबसे अत्याधुनिक मशीनें और तकनीक चीन को बेचने से रोकेगा। जासूसी के डर से चीनी 5G तकनीक को बाहर रखेगा। इस बीच, जिन क्षेत्रों में चीन आगे निकल चुका है, उनमें आगे बढ़ने के लिए अमेरिका अरबों डॉलर की सब्सिडी देगा।

कड़ी निगरानी की जरूरत
भारत की नीति में कई समानताएं हैं, लेकिन यहां ‘हाई फेंस, स्मॉल यार्ड’ जैसा अभी कुछ नहीं है। चीन की चालाकी कभी-कभी यह सुझाव देती है कि बड़े क्षेत्र में बेहद कड़ी निगरानी करने की जरूरत है। दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक वीकल कंपनी BYD के प्रस्ताव के बारे में मैं पहले ही लिख चुका हूं। अब टेस्ला से ज्यादा बिक्री बीवाईडी की है। टेस्ला सिर्फ लग्जरी कारें बनाती है, जबकि बीवाईडी के पोर्टफोलियो में महंगी के साथ सस्ती कारें भी शामिल हैं। बीते दिनों इस चीनी कंपनी ने भारत में अरबों डॉलर के निवेश का प्रस्ताव दिया था। भारत में कंपनी पहले ही छोटे स्तर पर ऑटो प्रोडक्शन कर रही है। कंपनी अब इसे बढ़ाना चाहती है और एक बड़ी बैटरी फैसिलिटी बनाना चाहती है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत सरकार ने बीवाईडी के इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया है।

इसी तरह, एक दूसरी चीनी कंपनी लक्सशेयर, एपल के एयर-पॉड और स्मार्ट वॉच बनाती है। एपल के प्रो-विजन हेडसेट के लिए इसे एकमात्र पार्टनर नियुक्त किया गया है। एक अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, लक्सशेयर को उसकी नवीनता और ‘क्रेजी आइडियाज’ के प्रति खुलेपन के कारण चुना गया था। भारत को इसी तरह की कंपनी की ज़रूरत है। इससे नए क्षेत्र खुलेंगे।

चीनी कंपनियों का दबदबा
भारत में ऐपल कंपनी अरबों डॉलर की कीमत के आईफोन का प्रोडक्शन और एक्सपोर्ट कर रही है। लेकिन इसकी वजह से जो वैल्यू एड होती है, वह काफी कम है। इसमें सुधार के लिए भारत को बड़े पैमाने पर कंपोनेंट्स के प्रोडक्शन की जरूरत है। सरकार इसके लिए भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता देती है। लेकिन, इस क्षेत्र में चीनी कंपनियों का दबदबा है। ऐसे में यह उम्मीद करना कि भारतीय नाम किसी तरह से इस कमी को पूरा कर देंगे, कल्पना है।

भारत में नवीकरणीय ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार एक अच्छा कदम है। हर तरह से उन भारतीय कंपनियों को मौका देना चाहिए, जिन्होंने अच्छे टेक्नॉलजी सप्लायर के साथ समझौता किया है। लेकिन, चीनी कंपनियों को भी परमीशन दें। स्टोरेज बैटरी से राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होती है, उस पर ख़तरा नहीं होता।

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