नई दिल्ली,
UPSC में लेटरल एंट्री को लेकर बहस छिड़ने के बीच मंगलवार को केंद्र सरकार ने लेटरल एंट्री के विज्ञापन पर रोक लगा दी है. इस संबंध में कार्मिक मंत्री ने यूपीएससी चेयरमैन को पत्र लिखा है.केंद्रीय कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी चेयरमैन को पत्र लिखकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर सीधी भर्ती के विज्ञापन पर रोक लगाई गई है. कार्मिक मंत्री ने पत्र में कहा कि सरकार ने यह फैसला लेटरल एंट्री के व्यापक पुनर्मूल्यांकन के तहत लिया है.
क्यों लिया गया ये फैसला?
इस पत्र में कहा गया है कि अधिकतर लेटर एंट्रीज 2014 से पहले की थी और इन्हें एडहॉक स्तर पर किया गया था. प्रधानमंत्री का विश्वास है कि लेटरल एंट्री हमारे संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के समान होनी चाहिए, विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के संबंध में किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए.
इस पत्र में कहा गया कि सामाजिक न्याय की दिशा में संवैधानिक जनादेश बनाए रखना जरूरी है ताकि वंचित समुदायों के योग्य उम्मीदवारों का सरकारी नौकरियों में सम्मानपूर्ण प्रतिनिधित्व हो. चूंकि, ये पद विशेष हैं ऐसे में इन पदों पर नियुक्तियों को लेकर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इसकी समीक्षा और जरूरत के अनुरूप इनमें सुधार की जरूरत है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी का पूरा फोकस सामाजिक न्याय की ओर है.
पत्र में कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि सार्वजनिक नौकरियों में सामाजिक न्याय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता होनी चाहिए. लेटरल एंट्री वाले पदों की समीक्षा किए जाने की जरूरत है. ऐसे में 17 अगस्त को जारी लेटरल एंट्री वाले विज्ञापन को रद्द कर दें. यह करना सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण की दृष्टि से बेहतर होगा.
लेटरल एंट्री: क्यों रोकी गई प्रक्रिया?
बताया जा रहा है कि कार्मिक विभाग की तरफ से यूपीएसी को एक विस्तृत चिट्ठी लिख दी गई है। उस चिट्ठी में माना जा रहा है कि लेटरल भर्ती पर रोक लगाने के लिए कहा गया है। बड़ी बात यह भी है कि पीएम मोदी के निर्देश के बाद ही यह चिट्ठी लिखी गई है। जानकार मानते हैं कि इस मुद्दे पर सरकार बैकफुट पर आ रही थी, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो इसे ओबीसी विरोधी तक बता डाला था। इसी बीच अब लेटरल एंट्री पर रोक लगाने का फैसला हुआ है।
लेटरल भर्ती में आरक्षण विवाद से परेशान मोदी सरकार
ऐसा कहा जा रहा है कि लेटरल एंट्री में क्योंकि आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है,इसी वजह से केंद्र ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। समझने वाली बात यह भी है कि इसी आरक्षण मुद्दे की वजह से लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा था। विपक्ष ने नेरेटिव सेट किया था कि बीजेपी आरक्षण खत्म कर देगी, संविधान को बदल देगी। लेकिन अब जब तीसरी बार सरकार बन गई है, पार्टी फूंक-फूंक कर हर कदम रखना चाहती है।
लेटरल एंट्री में होता क्या है?
वैसे लेटरल एंट्री को लेकर यह बात समझना जरूरी है कि इस प्रक्रिया से आए हुए लोग केंद्रीय सचिवालय का हिस्सा होते हैं, जिसमें उस समय तक केवल अखिल भारतीय सेवाओं/केंद्रीय सिविल सेवाओं से आने वाले नौकरशाह ही सेवा दे रहे थे। लेटरल एंट्री से आने वाले लोगों को तीन साल के कांट्रेक्ट पर रखा जाएगा जिसे पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है। लेकिन अभी के लिए उस विज्ञापन पर भी रोक लगी है और सीधी भर्ती भी नहीं होने जा रही है।
पूर्ववर्ती UPA सरकार पर साधा निशाना
पत्र में कहा गया कि लेटरल एंट्री का कॉन्सेप्ट 2005 में UPA सरकार लेकर आई थी. सभी जानते हैं कि 2005 में लेटरल एंट्री का प्रस्ताव आया था. तब वीरप्पा मोइली की अगुवाई में प्रशासनिक सुधार आयोग बना था, जिसमें ऐसी सिफारिशें की गई थीं. इसके बाद 2013 में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी इसी दिशा में की गई थीं. लेकिन उससे पहले और बाद में लेटरल एंट्री के कई मामले सामने आए थे.
क्या था 17 अगस्त का आदेश?
इससे पहले UPSC ने 17 अगस्त को एक विज्ञापन जारी किया था, जिसमें लेटरल एंट्री के जरिए 45 जॉइंट सेक्रेटरी, डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर लेवल की भर्तियां निकाली गई थी. लेटरल भर्ती में कैंडिडेट्स बिना UPSC की परीक्षा दिए रिक्रूट किए जाते हैं. इसमें आरक्षण के नियमों का भी फायदा नहीं मिलता है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि महत्वपूर्ण पदों पर लेटरल एंट्री के जरिए भर्ती कर खुलेआम SC, ST और OBC वर्ग का आरक्षण छीना जा रहा है.
इस पर विवाद बढ़ने पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मोर्चा संभालते हुए कहा था कि नौकरशाही में लेटरल एंट्री नई बात नहीं है. 1970 के दशक से कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान लेटरल एंट्री होती रही है और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी ऐसी पहलों के प्रमुख उदाहरण हैं.
