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अब आया है भारत का स्वर्णकाल, पहले नहीं था सोने की चिड़िया! देख लीजिए आंकड़े

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नई दिल्ली

स्वतंत्रता दिवस के करीब आते ही हम भारत के लंबे इतिहास के बारे में बाते करने लगते हैं जिसका पटाक्षेप आजादी के साथ हुआ था। जवाहर लाल नेहरू और अधिकांश राष्ट्रवादी इतिहासकार मानते थे कि भारत पर यूनानियों, हूणों, कुषाणों, सीथियंस, अफगानों और उजबेकों (मुगलों) ने हमला किया। हर आक्रांता ने देश में संस्कृति और धर्म की एक नई परत जोड़ी। नेहरू भारत को एक शानदार बहुस्तरीय सभ्यता मानते थे। संघ परिवार का विचार अलग है। वह भारत को एक महान हिंदू सभ्यता मानता है जो कभी सोने की चिड़िया कहलाती थी। लेकिन मुस्लिम और ईसाई आक्रांताओं ने भारत को गरीब बना दिया। आरएसएस के विचारक एस गुरुमूर्ति इस विचार के अगुआ हैं। उनका दावा है कि पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत की गलत व्याख्या की। उन्होंने भारत के चरित्र और उपलब्धियों को कमतर दिखाया ताकि भारतीय उपनिवेशवाद के चश्मे से भारत को देखें। उनका आरोप है कि कांग्रेस ने यूरोप के इस मिथक को जारी रखा और खुद को मार्क्सवादी और समाजवादी विचारकों के साथ जोड़ लिया। ये लोग हिंदू धर्म को अच्छी दृष्टि से नहीं देखते हैं।

गुरुमूर्ति स्विस इकनॉमिस्ट हिस्टोरियन Paul Bairoch के काम का हवाला देते हुए कहते हैं कि पुराने जमाने में दुनिया की जीडीपी में भारत का हिस्सा सबसे ज्यादा था। लेकिन जब भारत को आजादी मिली तो यह बेहद मामूली रह गया था। ओईसीडी ने जानेमाने इतिहासकार एंगस मेडीसन को इस मामले पर और शोध करने को कहा था। मेडीसन ने अपनी किताब ‘Contours of the World Economy 1-2030 AD: Essays in Macro Economic History’ में अनुमान लगाया है कि 1 एडी में हिंदू काल में दुनिया की जीडीपी में भारत का हिस्सा 32 परसेंट था। यह दुनिया के किसी भी क्षेत्र की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी थी। मुस्लिम काल में यह 1000 एडी में 28.1 परसेंट रह गई और फिर 1700 में घटकर 24.4 परसेंट पर आ गई थी। अंग्रेजों के दौर में इसमें भारी गिरावट आई और 1950 में यह महज 4.2 परसेंट रह गई। यह सोने की चिड़िया वाली थीसिस का आधार है।

मेडीसन का सच
मेडीसन के फाइंडिंग्स से संघ परिवार गदगद है। उसने कांग्रेस और कम्युनिस्टों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने इतिहास की किताबों में हिंदू शासन के दौर की उपलब्धियों को नजरअंदाज किया है। उस दौर की उपलब्धियों को दिखाने के लिए इतिहास की किताबों में बदलाव किया गया है। लेकिन मेडीसन के काम पर करीबी नजर डालें तो पता चलता है कि संघ ने इसमें से केवल अपने फायदे की चीजें उठाई गई हैं। मेडीसन की व्यापक काम भारत के लिए कुछ और ही कहानी कहता है। साल 1 एडी में भारत की आबादी दुनिया की 33.2 परसेंट थी। यह देश की जीडीपी शेयर से थोड़ा ज्यादा थी। यानी भारत की जीडीपी दुनिया के औसत से कम थी। रोमन साम्राज्य के अधीन इटली भारत से करीब दोगुना ज्यादा अमीर था। भारत की हाई जीडीपी से समृद्धि की नहीं बल्कि ज्यादा आबादी की झलक मिलती है।

मेडीसन के मुताबिक 1 एडी से 1000 एडी तक हिंदू शासन काल में भारत की जीडीपी 33.75 अरब डॉलर पर स्थिर बनी रही। इस दौरान प्रति व्यक्ति आय भी 450 डॉलर पर स्थिर रही क्योंकि आबादी करीब 7.5 करोड़ पर स्थिर रही। सवाल उठता है कि एक हजार साल तक देश की आबादी क्यों नहीं बढ़ी? इसकी वजह यह है कि सूखे, बीमारी और लड़ाइयों के कारण जिंदा रहना ही बड़ी चुनौती था। बाकी दुनिया का भी यही हाल था। कुल मिलाकर एक से लेकर 1000 एडी का समय गरीबी, आर्थिक ठहराव और ज्यादा मृत्युदर का समय था। यह सोने की चिड़िया वाला दौर नहीं था।

अब आया है गोल्डन पीरियड
मुस्लिम शासन काल में 1000 से 1700 के बीच भारत की सालाना जीडीपी करीब तिगुना होकर 90.7 अरब डॉलर पहुंच गई। मृत्युदर में भी गिरावट आई और आबादी 7.5 करोड़ से 16.5 करोड़ पहुंच गई। आबादी में आए उछाल ने जीडीपी ग्रोथ को ऑफसेट कर दिया। प्रति व्यक्ति आय 450 डॉलर से बढ़कर 550 डॉलर पहुंच गई। अंग्रेजों के जमाने में 1700 से 1950 के बीच जीडीपी बढ़कर 222.22 अरब डॉलर हो गई और आबादी 35.9 करोड़ पहुंच गई। लेकिन प्रति व्यक्ति आय मामूली बढ़कर 619 डॉलर पहुंची। साफ है कि अंग्रेजों का यह दावा कि उन्होंने भारत को पिछड़ेपन से बाहर निकाला, बढ़ाचढ़ाकर किया गया है। हालांकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अंग्रेजों के जमाने में नहीं पिछड़ा। दुनिया की जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी कम होने की वजह यह थी कि औद्योगिक क्रांति के कारण पश्चिम का हिस्सा बढ़ गया।

आजादी मिलने के बाद देश में आर्थिक विकास को गति मिली। करीब 2000 साल के बाद 2003 में प्रति व्यक्ति आय 2,140 डॉलर पहुंची। मृत्युदर में भारी गिरावट आई और 2003 में आबादी 1.05 अरब पहुंच गई। अब सही मायनों में भारत का स्वर्णकाल आया है। अल्पसंख्यकों के साथ दुर्व्यवहार के लिए यह बहाना नहीं होना चाहिए कि हिंदू राज में भारत अमीर था और मुस्लिम और ईसाई हमलावरों ने उसे गरीब बना दिया। सोशल मीडिया पर ट्रोल बेहद जहरीला है। नफरत की राजनीति को हवा देने के लिए गलत इतिहास का सहारा लिया जा रहा है।

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