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Wednesday, April 1, 2026
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PM मोदी ने बनाया था रास्ता, समर्थन में CM नीतीश, बढ़ेगा आरक्षण का दायरा?

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पटना

सुप्रीम कोर्ट ने EWS यानी आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण वर्गों को दिए 10 फीसदी आरक्षण को सही ठहराया। ये आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया गया है। इसमें सवर्ण जाति के लोगों को ही शामिल किया गया है। इसमें SC/ST, OBC, EBC को इस दायरे से बाहर रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही देश में एक बार फिर से आरक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बहस छिड़ चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए आरक्षण का दायरा बढ़ाने तक की मांग कर डाली।

आबादी के अनुसार नहीं मिल रहा आरक्षण- नीतीश
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10 प्रतिशत का आरक्षण पहले ही हो गया था। हम लोगों ने भी कहा था और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया। अब ये जरूरी है कि एक बार जाति आधारित जनगणना ठीक से हो जाए। दूसरी बात कि जो आरक्षण का लिमिट 50 प्रतिशत का है, अब उसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) को तो उनकी आबादी के अनुसार आरक्षण मिल जाता है लेकिन ओबीसी (OBC) और ईबीसी (EBC) को आबादी के हिसाब से आरक्षण नहीं मिल पाता है। 10 प्रतिशत आर्थिक तौर से पिछड़े सवर्णो को आरक्षण का लाभ मिल गया। अब अच्छा होगा कि जो 50 प्रतिशत का लिमिटेशन है, उसको बढ़ाना चाहिए और ये अच्छी बात होगी।

नीतीश ने सुझाया आरक्षण लिमिट बढ़ाने का फॉर्मूला
नीतीश कुमार ने कहा कि इसके लिए जरूरी है कि पूरे देश में एक-एक जातियों का आकलन हो जाए। ताकि जिनकी जिस तरह से आबादी है, उसी तरह से उन्हें आरक्षण मिल सके। नीतीश कुमार ने कहा कि वो शुरू से इस बात को कह रहे हैं। राज्य में जाति आधारित जनगणना भी कराने जा रहे हैं। जातीय जनगणना में उनकी आर्थिक स्थिति को भी देखा जाएगा। उसके स्थिति में सुधार करने के लिए काम किया जा सके। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये भी कहा कि देशभर में जाति आधारित जनगणना हो ताकि आरक्षण का लिमिट 50 प्रतिशत से आगे बढ़े। ये सबसे अच्छी बात होगी।

2019 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने बनाया था रास्ता
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक का आरक्षण नहीं दिया जा सकता था। लेकिन 2019 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने अगड़ी जाति से आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन किया था। इससे आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत होने का रास्ता साफ हो गया था। संसद के दोनों सदनों से पास कराए गए इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सोमवार यानी 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जाति के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने को सही करार देते हुए अपना फैसला सुना दिया।

कई राज्य बढ़ाना चाहते हैं आरक्षण की सीमा
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत में बदलाव को लेकर राज्यों से उनकी राय मांगी थी। तब राज्यों की ओर से जो राय सामने आई थी, उससे ये पता चला कि ज्यादातर राज्य आरक्षण के लिए तय की गई 50 फीसदी की सीमा के दायरे को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। कर्नाटक, झारखंड, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य भी आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के पक्ष में खड़े नजर आए।

70 फीसदी तक रिजर्वेशन चाहते हैं राज्य
30 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ही इंदिरा साहनी मामले में एक फैसला सुनाया था, जिसमें जाति आधारित रिजर्वेशन की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय कर दी गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला एक कानून बन गया, जिसके अनुसार इससे अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता। कर्नाटक की सरकार 70 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश 55 प्रतिशत और तेलंगाना की सरकार 62 प्रतिशत तक आरक्षण का दायरा बढ़ाना चाहती है। इसके अलावे झारखंड, राजस्थान और हरियाणा सरकार भी आरक्षण का दायरा बढ़ाए जाने के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। देश में तमिलनाडु इकलौता ऐसा राज्य है, जहां कई वर्षों से 50 प्रतिशत के सीमित दायरे से ज्यादा 69 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है।

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