नई दिल्ली,
चीन के इशारे पर नाचने वाले केपी शर्मा ओली के समर्थन से सत्ता में आए नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने भारत के साथ अच्छे रिश्ते का वादा किया था। नेपाली प्रधानमंत्री के सत्ता में आए अभी कुछ ही दिन हुए हैं लेकिन उन्होंने भारत विरोधी चाल चलनी शुरू कर दी है। ओली और प्रचंड के सत्तारूढ़ गठबंधन ने ऐलान किया है कि वह भारत के लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को वापस लेकर रहेंगे। इस गठबंधन ने अपना न्यूनतम साझा कार्यक्रम का ऐलान किया है जिसमें इन भारतीय इलाकों को वापस लेने प्रण किया गया है। वहीं प्रचंड और ओली ने चीन के नेपाली जमीन पर कब्जे पर चुप्पी साध रखी है।
सोमवार को जारी हुए इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में सरकार क्षेत्रीय एकजुटता, संप्रभुता और स्वतंत्रता को मजबूत करेगा। ओली के समर्थन से बनी नेपाल की नई सरकार जहां भारत को आंखें दिखा रही है, वहीं चीन के नेपाली जमीन पर कब्जे पर मुंह बंद कर लिया है। इससे पहले ओली ने प्रधानमंत्री रहने के दौरान साल 2020 में नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था जिसमें न केवल लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाली इलाका बताया था बल्कि भारत की भी काफी जमीन को नेपाल का बता दिया था।
भारत दौरे पर सीमा मुद्दा उठाएंगे प्रचंड
यही नहीं केपी ओली ने भारत को दो राजनयिक नोट भी भेजे थे और कहा था कि भारत के नक्शे में सुधार के लिए कहा था। भारत ने चीनी राजदूत के इशारे पर केपी ओली की चली इस चाल को खारिज कर दिया था। नेपाली प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों ने काठमांडू पोस्ट अखबार को बताया कि प्रचंड अपने पहले विदेश दौरे पर भारत जा रहे हैं और इस दौरान सीमा विवाद का मुद्दा शीर्ष प्राथमिकता के साथ उठाया जाएगा। बताया जा रहा है कि प्रचंड फरवरी या उसके बाद भारत के आधिकारिक दौरे पर आएंगे।
प्रचंड ने अभी तक अपने विदेश मंत्री की नियुक्ति नहीं की है जो पड़ोसी देशों के साथ विवाद को सुलझाने के लिए बेहद अहम है। भारत में पूर्व नेपाली राजदूत नीलांबर आचार्य ने कहा, ‘भारत के साथ इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर बातचीत के लिए हमें पहले यह स्पष्ट होना होगा कि किस स्तर तक हम इसे उठाने की योजना बना रहे हैं। नई दिल्ली में हमारा राजदूत बहुत ही मुश्किल से भारत के मंत्रियों और विदेश सचिवों से मुलाकात कर पाता है। ऐसे में पीएम प्रचंड और उनके मंत्रियों को खुद ही इस मुद्दे को उठाना चाहिए।’
‘भारत और चीन के बीच संतुलित रिश्ता’
आचार्य उस समय नेपाल के भारत में राजदूत थे जब नेपाल ने देश का विवादित राजनीतिक नक्शा जारी किया था। वह भारत के साथ विवादों के समाधान को विभिन्न मंचों पर उठाने के समर्थक हैं। इस नेपाली नक्शे के बाद भारत और नेपाल के बीच रिश्ते बहुत ही खराब हो गए थे। इससे पहले पिछले साल अप्रैल महीने में नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीमा विवाद के मुद्दे को उठाया था। इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम में दोनों ही राजनीतिक दलों ने वादा किया है कि वे भारत और चीन के बीच संतुलित रिश्ता बनाएंगे।
पिछले साल अप्रैल में जब नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा भारत यात्रा पर थे, तो उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष इस मुद्दे को उठाया था. हालांकि, यह बात आगे नहीं बढ़ पाई और मामला शांत हो गया.पूर्व राजनयिक आचार्य ने आगे कहा कि, ”सिर्फ भारत की सरकार ही नहीं बल्कि भारत के लोगों को भी नेपाल के साथ सीमा विवाद की जानकारी होनी चाहिए. हमें इस लक्ष्य को पाने के लिए कूटनीति के अलग-अलग विकल्पों को देखना होगा. यह सार्वजनिक तरह से भी हो सकता है या गुपचुप तरह भी. लेकिन सवाल ये है कि हम किस स्तर पर, कब और कैसे इन बातों की शुरुआत करेंगे.”
वहीं पूर्व नेपाली राजदूत खागानाथ अधिकारी ने कहा कि, कब्जे वाली जमीन को वापस पाने के लिए भारत से बात करने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा कि इस बारे में बातचीत के लिए कुशल कूटनीति की जरूरत है. अधिकारी ने कहा कि ना हम भारत से झगड़ा कर सकते हैं और ना ही हम सेना को भेजकर अपनी जमीन पर फिर कब्जा पा सकते हैं. इसलिए सिर्फ कूटनीति के जरिए ही इस पर बात की जा सकती है.
साल 2019 से नेपाल और भारत के बीच बढ़ता हुआ सीमावर्ती विवाद
साल 2019 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार और भारत सरकार के बीच उस समय सबकुछ ठीक नहीं रह गया था, जब भारत ने अपना राजनीतिक नक्शा जारी किया था. इस राजनीतिक मैप में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को शामिल किए जाने पर नेपाल की सरकार ने विरोध जताया था. नेपाल इन इलाकों पर अपना दावा पेश करता है.
उस समय केपी शर्मा ओली ने राजनयिक संदेश भेजकर भारत से इस बारे में चर्चा करने के लिए कहा था. साथ ही कहा था कि भारत की ओर से मैप में सुधार किया जाए. कुछ दिनों बाद ही कोरोना आ गया और भारत ने महामारी का समय देखते हुए इस मामले में तुरंत चर्चा करने से इनकार कर दिया.
साल 2020 के मई में जब कोरोना चरम पर था, उस समय भी भारत की ओर से राजनीतिक मैप जारी किया गया, जिसमें भी तीनों इलाकों को भारत का हिस्सा बताया गया. इस बात पर खफा केपी ओली सरकार ने भी नेपाल का नया मानचित्र जारी किया, जिसमें इन तीनों इलाकों को नेपाली सीमा के अंदर दिखाया गया.
प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की पहली यात्रा का रिवाज तोड़ चुके हैं प्रचंड
नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का देश के शीर्ष नेता के रूप में यह पहला कार्यकाल नहीं है. इससे पहले प्रचंड साल 2008 से 2009 तक और साल 2016 से 2017 तक प्रधानमंत्री रहे हैं. नेपाल का एक रिवाज रहा है कि जब भी वहां कोई प्रधानमंत्री बनता है तो उसकी पहली आधिकारिक यात्रा भारत की होती है. लेकिन जब पहली बार प्रचंड को नेपाल की सत्ता मिली तो उन्होंने यह रिवाज तोड़ने में देर नहीं लगाई और वे भारत की जगह चीन पहुंच गए.
अब जब प्रचंड ने एक बार फिर नेपाल की सत्ता संभाल ली है, कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रचंड इस सीमा विवाद को राष्ट्रवाद के नाम पर भुना सकते हैं. दरअसल, जिस तरह का राष्ट्रवाद कुछ दशकों पहले गुलामी से आजादी की सुबह देखने वाले भारत में है, उस तरह का राष्ट्रवाद नेपाल में देखने को नहीं मिलता है.भारत को आजादी मिली तो पाकिस्तान और चीन से विवाद शुरू हो गया, जिस पर लोग भी भड़के और राष्ट्रवाद की लहर बनी रही. लेकिन नेपाल में ऐसा कुछ नहीं है. अब सिर्फ भारत का विरोध ही है जो कम से कम नेपाली नेताओं की घरेलू राजनीति को चमका सकता है
