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आंसुओं का आकलन सही तरह से हो….सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग के रेप में आरोपी को सजा सुनाई

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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस फैसले की कड़ी आलोचना की, जिसमें एक नाबालिग लड़की से बलात्कार के आरोपी की सजा को केवल इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि पीड़िता जिरह (cross-examination) के दौरान चुप रही और केवल आंसू बहाए। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले खारिज करते हुए कहा है कि नाबालिग पीड़िता की चुप्पी को आरोपी के पक्ष में मानना गलत है। इन आंसुओं का मूल्यांकन उनके सही संदर्भ में किया जाना चाहिए। यह चुप्पी एक बच्चे की चुप्पी है, जिसे एक वयस्क महिला की चुप्पी के समान नहीं माना जा सकता।

SC ने हाई कोर्ट के फैसले पर जताई हैरानी
सुप्रीम कोर्ट ने 18 मार्च को दिए फैसले में इस बात पर हैरानी जताई कि हाई कोर्ट ने मात्र 6 पन्नों के आदेश में ट्रायल कोर्ट के एक सुविचारित फैसले को खारिज कर दिया और आधार यह बताया कि पीड़िता ने जिरह के दौरान कोई बयान नहीं दिया और वह चुप रही थी और रो रही थी। हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा को यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि पीड़िता ने अपनी गवाही के दौरान कोई बयान नहीं दिया और इसलिए प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव में आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने HC के फैसले को पलटा
राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की बेंच ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया और कहा कि केवल पीड़िता की चुप्पी अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं कर सकती, खासकर जब अन्य सबूत, जैसे कि मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य, आरोपी के दोषी होने की ओर इशारा कर रहे हों।अदालत ने कहा कि यह सच है कि पीड़िता नाबालिग लड़की ने उसके खिलाफ किए गए अपराध के बारे में कुछ नहीं कहा। जब उससे घटना के बारे में पूछा गया, तो ट्रायल कोर्ट ने दर्ज किया कि पीड़िता चुप रही और केवल आंसू बहाए। इस गवाही से अपराध के बारे में कोई सीधा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन हमारी नजर में इसे आरोपी के पक्ष में उपयोग नहीं किया जा सकता। इन आंसुओं का मूल्यांकन उनके सही संदर्भ में किया जाना चाहिए। यह चुप्पी एक बच्चे की चुप्पी है, जिसे एक वयस्क महिला की चुप्पी के समान नहीं माना जा सकता।

‘घटना के ट्रॉमा के चलते गवाही नहीं दे पाई पीड़िता’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर बलात्कार मामलों में पीड़िता की गवाही एक महत्वपूर्ण साक्ष्य होती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि यदि पीड़िता बयान नहीं देती तो अभियोजन पक्ष का पूरा मामला कमजोर हो जाएगा। खासकर जब अन्य ठोस सबूत मौजूद हों। अदालत ने माना कि पीड़िता एक बच्ची थी और घटना के समय आघात (trauma) के कारण वह गवाही नहीं दे सकी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक बच्चे की गवाही की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए, लेकिन यदि यह विश्वसनीय पाई जाती है तो यह अकेले ही दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। महाराष्ट्र सरकार बनाम भानु केस को रेफर करते हुए कहा कि पीड़िता ‘बधिर और मानसिक रूप से विकलांग’ थी और गवाही देने में असमर्थ थी। फिर भी, अदालत ने अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया।

यह घटना 1986 में हुई थी, और हाई कोर्ट में अपील 1987 में दायर की गई थी, लेकिन इस पर फैसला 2013 में आया। राजस्थान सरकार की अपील स्वीकार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की 7 साल की सजा को बहाल कर दिया और कहा कि यह अत्यंत दुखद है कि इस नाबालिग लड़की और उसके परिवार को लगभग चार दशक तक इस भयावह घटना के दर्द और प्रतीक्षा से गुजरना पड़ा

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