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Monday, May 4, 2026
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‘कौन-क्या खाएगा ये हम तय नहीं कर सकते…’, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला, यह है पूरा मामला

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लक्षद्वीप प्रशासन के उस फैसले पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें बच्चों को स्कूल के मिडडे मील से चिकन समेत सभी मांसाहारी खाने को अलग करने का फैसला लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि किसको क्या खाना चाहिए या क्या नहीं खाना चाहिए, यह वह तय नहीं कर सकता है।

इसे “नीतिगत फैसला” बताते हुए कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक समीक्षा के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। अदालत ने कहा कि “किसी विशेष क्षेत्र के बच्चों के लिए भोजन का विकल्प क्या होगा, यह तय करना उसके “क्षेत्र” में नहीं है। जस्टिस अनिरुद्ध बोस और बेला एम त्रिवेदी की खंडपीठ ने कहा कि अपीलकर्ता ने किसी कानूनी प्रावधान के उल्लंघन का उल्लेख नहीं किया है।

सितंबर 2021 में केरल हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था याचिका
केरल उच्च न्यायालय ने सितंबर 2021 में कवरत्ती के वकील अजमल अहमद आर की जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें संघ शासित क्षेत्र में पशुपालन विभाग द्वारा स्कूल के भोजन से चिकन और अन्य मांस को हटाने के प्रशासन के फैसले के साथ-साथ डेयरी फार्मों को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमें जनहित याचिका खारिज करने के केरल हाईकोर्ट के फैसले में कोई कमी नहीं मिली है। जहां तक मिडडे मील का सवाल है, प्रशासन ने अंडे और मछली जैसे मांसाहारी आयटमों को बरकरार रखा है, जिसके बारे में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज का कहना है कि इन द्वीपों में यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। इस अपील में जिस बात पर सवाल उठाया जा रहा है वह मुख्य रूप से प्रशासन का नीतिगत निर्णय है और किसी भी कानूनी प्रावधान के उल्लंघन की बात नहीं कही गई है। यह तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि किसी विशेष क्षेत्र के बच्चों के लिए भोजन का विकल्प क्या होगा। इस संबंध में कानून अदालतों द्वारा अनुमान लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है।”

पीठ ने कहा, “अदालत को इस संबंध में प्रशासनिक निर्णय को स्वीकार करना होगा जब तक कि कुछ बड़े मनमानेपन की ओर इशारा नहीं किया जाता है। जैसा कि हमने पहले ही संकेत दिया है, जहां तक उठाए गए निर्णयों का संबंध है, कोई कानूनी उल्लंघन नहीं हुआ है। हम अपील को खारिज करते हैं… यह नीतिगत निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आएगा।”

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