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Wednesday, January 21, 2026
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80 रुपये का हुआ एक डॉलर, आयातकों को नुकसान, निर्यातकों को फायदा

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नई दिल्ली

भारत के इतिहास में शायद आज का दिन हमेशा याद रखा जाएगा। कई हफ्तों से लगातार गिर रहा रुपया आज डॉलर के मुकाबले 80 रुपये के स्तर पर पहुंच गया। ये पहली बार है जब रुपया इतना नीचे गिरा है। अगर बात सिर्फ इस साल की करें तो आज की तारीख तक रुपये में करीब 7 फीसदी की तगड़ी गिरावट देखने को मिली है। रुपये का गिरना हमेशा से ही चर्चा में रहने वाला विषय रहा है। राजनीति में भी रुपये की गिरावट को तमाम पार्टियां एक अहम हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट आना चिंता का विषय क्यों है? आइए जानते हैं रुपये में गिरावट का आम आदमी पर और देश की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर।

आम आदमी पर होगा क्या असर?
रुपये की गिरावट का आम आदमी पर सीधा असर देखने को मिलेगा। आम आदमी के लिए वह हर चीज महंगी हो जाएगी जो विदेशों से आयात की जाती है। सबसे बड़ा असर पेट्रोल-डीजल पर देखने को मिल सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कच्चे तेल का आयात करने में भुगतान डॉलर में करना होता है। भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। हाल ही में खबर आई थी कि कच्चा तेल गिरकर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है, जिससे पेट्रोल-डीजल सस्ते हो सकते हैं। हालांकि, रुपया इतना नीचे गिर जाने के चलते राहत की उम्मीद टूटती नजर आ रही है। इसके अलावा विदेशों से आयात किए जाने वाले खाने के तेल महंगे हो सकते हैं। सोने का दाम एक बार फिर से तेजी से बढ़ना शुरू हो सकता है।

आयातकों को नुकसान, निर्यातकों को फायदा
रुपये में गिरावट का असर सबसे अधिक आयातकों और निर्यातकों पर देखने को मिलेगा। रुपये में गिरावट की वजह से आयात महंगा हो जाएगा, क्योंकि हमें कीमत डॉलर में चुकानी होती है। ऐसे में पहले 1 डॉलर के लिए जहां 74-75 रुपये चुकाने होते थे, वहीं अब 80 रुपये चुकाने पड़ेंगे। वहीं इसका उल्टा निर्यातकों को रुपये में गिरावट का फायदा होगा, क्योंकि हमें भुगतान डॉलर में होता है और अब एक डॉलर की कीमत रुपये के मुकाबले बढ़ चुकी है। मसलन सॉफ्टवेयर कंपनियों और फार्मा कंपनियों को फायदा होता है। हालांकि कुछ एक्सपोर्टरों पर महंगाई दर ज्यादा होने से लागत का बोझ पड़ता है और वे रुपये में गिरावट का ज्यादा फायदा नहीं उठा पाते हैं। मसलन जेम्स-जूलरी, पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स, ऑटोमोबाइल, मशीनरी को आइटम बनाने वाली कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इससे उनके मार्जिन पर असर पड़ता है।

विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों के माथे पर शिकन
भारतीय छात्रों के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने का सपना पूरा करना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अब उन्हें अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए अधिक पैसा खर्च करना होगा और अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें ऐसे देश का चुनाव करना होगा, जहां पढ़ाई अपेक्षाकृत सस्ती हो। एक ओर, वित्तीय संस्थानों को लगता है कि चिंताएं वास्तविक हैं और भारी-भरकम शिक्षा ऋण लेने की जरूरत बढ़ सकती है, तो विदेश में रहने वाले शिक्षा सलाहकारों का मानना है कि उन छात्रों को इतनी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, जो पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत से 13.24 लाख से अधिक छात्र उच्च अध्ययन के लिए विदेश गए हैं, जिनमें से अधिकांश अमेरिका (4.65 लाख), इसके बाद कनाडा (1.83 लाख), संयुक्त अरब अमीरात (1.64 लाख) और ऑस्ट्रेलिया (1.09 लाख) में हैं।

विदेश से रेमिटांस पाने वालों को होगा फायदा
ऐसे बहुत सारे छात्र हैं जो विदेश जाकर वहां पढ़ने और फिर वहीं पर नौकरी करने का सपना देखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि रुपये के मुकाबले डॉलर मजबूत है। ऐसे में जब वह विदेश में पैसे कमाकर भारत में अपने परिवार को भेजते हैं तो यहां उन पैसों की कीमत कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे लोगों को रुपये में गिरावट का फायदा मिलेगा। अगर आपके पास भी विदेश से पैसे आते हैं तो अब आपके पहले जितने डॉलर की कीमत ही अधिक रुपयों के बराबर हो जाएगी।

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