क्या अखिलेश को 2024 लोकसभा चुनाव के लिए नए दोस्त की है तलाश? जानिए क्याें हो रही चर्चा

लखनऊ

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव इस समय एक साथ कई चुनौतियों से घिरे दिखाई दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव में खड़ा किया गया उनका गठबंधन टूटता दिख रहा है। पूर्वांचल से प्रमुख सहयोगी सुभासपा की राहें जुदा हो चुकी हैं। वहीं चाचा शिवपाल्र जिन्होंने चुनाव के दौरान अखिलेश से सुलह कर ली थी, वो भी अब अलग हो गए हैं। सहारनपुर में पार्टी में अंतर्कलह सामने आ रही है, यहां इमरान मसूद और आशु मलिक जिला पंचायत सदस्य के उपचुनाव को लेकर आमने-सामने आ गए हैं। वहीं मुस्लिम नेताओं की नाराजगी भी मुद्दा है। इन सबके बीच अखिलेश ये जाहिर कर रहे हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा लेकिन बदलती स्थितियां साफ दिखा रही हैं कि भविष्य की राह कठिन है। इस बीच वाराणसी में अखिलेश यादव का सोनिया गांधी के समर्थन में दिए गए बयान के सियासी मतलब निकाले जाने लगे हैं।

वैसे मुलायम सिंह यादव की तुलना में अखिलेश यादव कांग्रेस के ज्यादा करीब रह चुके हैं। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन यह प्रयाेग पूरी तरह फेल रहा। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही अखिलेश और राहुल गांधी की राहें जुदा हो गई थीं। और इसके बाद से ही अखिलेश की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से नजदीकी बढ़ती गई। इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में भी अखिलेश का यही रुख देने को मिला। उन्होंने साफ कह दिया कि तृणमूल कांग्रेस के निर्णय का वह समर्थन करेंगे और अखिलेश ने ऐसा किया भी।

लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनैतिक स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। बीजेपी जो अभी तक अखिलेश यादव से सत्ता छीन रही थी वो अब सपा और खासकर यादव परिवार के गढ़ पर भी कब्जा करती दिख रही है। हाल ही में हुए आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में साफ जाहिर हो गया कि 2024 के चुनाव में अखिलेश के लिए चुनौती गंभीर है।

विपक्षी एकता पर जोर, सोनिया का जिक्र
अखिलेश भी रास्ते तलाश रहे हैं। वह विपक्षी एकता पर जोर दे रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ भी संवेदना जता रहे हैं। वाराणसी में अखिलेश यादव ने गुरुवार को कहा कि भाजपा बांटो और राज करो की नीति पर काम कर रही है। अब विपक्ष को भी बांटने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। ईडी और सीबीआई के जरिए विपक्ष को बांटकर और डराकर रखना चाहती है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है।

अखिलेश यादव ने कहा कि ईडी और सीबीआई का प्रयोग महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों में भी किया गया है। विपक्ष के नेताओं को इन जांच एजेंसियों के माध्यम से परेशान किया जा रहा है। अब तो कांग्रेस की अध्यक्ष को भी ईडी ने बुला लिया है। कांग्रेस की अध्यक्ष को बुलाकर केन्द्र सरकार यह संदेश देना चाह रही है कि जो विरोध में बोलेगा उस पर ईडी का इस्तेमाल होगा।

बता दें 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सपा का ‘यूपी के लड़के’ वाला प्रयोग पूरी तरह फेल रहा था। चुनाव में सपा 311 सीटों पर लड़ी थी और सिर्फ 47 सीटें जीत सकी थी, वहीं कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा और 7 सीटें ही जीत सकी।

सपा गठबंधन से सहयोगियों को मिलता रहा है लाभ
अखिलेश इसके बाद के चुनावों में किसी तरह साख तो बचाते रहे लेकिन सत्ता उनसे दूर ही रही। दिलचस्प बात ये रही कि इस दौरान गठबंधन का फायदा ज्यादातर उनके सहयोगियों को ही मिला। 2019 के लोकसभा चुनाव की बात ही कर लें, यहां अखिलेश ने बसपा के साथ गठबंधन किया और बराबर सीटें बांटकर चुनाव लड़ा। यहां बसपा 10 सीटें जीतने में सफल रही, वहीं सपा महज 5 सीटें ही हासिल कर सकी। अब तो उपचुनाव के बाद सपा के पास सिर्फ 3 सीटें ही बची हैं।

इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने छोटे दलों के साथ गठबंधन किया। पार्टी 47 सीटों के आंकड़े से ऊपर जरूर उठी और 111 तक पहुंच गई लेकिन बहुमत के मैजिक नंबर से कोसों दूर ही रही। उलटे राष्ट्रीय लोकदल जो यूपी में पिछले चुनावों में हाशिए पर चली गई थी, वह 8 सीटें जीतने में सफल रही, यही नहीं सपा की सहयोगी सुभासपा भी 6 सीटें जीत गई।

अब चुनाव बाद बदले माहौल में सपा के गठबंधन में फूट पड़ती दिख रही है। सुभासपा की राहें जुदा हो गई है। अब अखिलेश और ओम प्रकाश राजभर में बयानबाजियों का दौर शुरू हो गया है। वाराणसी में अखिलेश ने कहा कि ओम प्रकाश राजभर का भाजपा के साथ तालमेल है तो उसके साथ जाए। सबको पता है कि ओम प्रकाश राजभर किसके इशारे पर बयानबाजी कर रहे हैं। ओम प्रकाश राजभर पर भाजपा द्वारा गठबंधन तोड़ने और बयानबाजी करने का दबाव डाला गया है। हो सकता है कि ओम प्रकाश राजभर ईडी के दबाव में आकर भी बयानबाजी कर रहे हों। राजभर को सुरक्षा मिलने पर उन्होंने कहा कि जो भाजपा को खुश रखेगा उसे सुरक्षा मिलेगी और वह स्वतंत्र घूमेगा।

सुभासपा ही नहीं अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल को भी स्वतंत्र करने की बात कही है। दरअसल चाचा शिवपाल जो सपा से ही विधायक हैं, वो भी अब वापस अपनी पार्टी खड़ी करने में जुट चुके हैं। ऐसे बदले माहौल में अखिलेश यादव का सोनिया गांधी को लेकर दिया गया बयान, कहीं न कहीं 2024 के आम चुनावों की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

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