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देख लीजिए नीतीश जी… बाढ़ पीड़ित ताकते रहे और आपके ‘घर’ में रखे-रखे चूड़ा सड़ गया!

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नालंदा

बिहार में बाढ़, कोई नई बात नहीं है। बाढ़ हर साल आती है, बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार पानी की तरह पैसा भी बहाती है। अगर वही पैसा पानी में चला जाए तो आप क्या कहेंगे। कुछ ऐसा ही मामला बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा से सामने आया है। यहां पर साल 2019 में बाढ़ राहत के तहत सैकड़ों पैकेट चूड़ा मंगाया गया था। चूड़ा का वितरण करना था, लेकिन वितरण के बजाय उसे श्रमिक कार्यालय में रखकर सड़ा दिया गया और तीन साल बाद उसे डंप करा दिया गया। जानकारी के अनुसार, एक टन से अधिक चूड़ा को डंप किया गया है।

चूक नहीं, अनदेखी का नतीजा है
रखे-रखे चूड़ा सड़ जाए, यह प्रशासनिक अधिकारियों की चूक नहीं, बल्कि यह उनकी अनदेखी का नतीजा है। साल 2019 में बाढ़ पीड़ितों के बीच बांटने के लिए लाया गया चूड़ा, गुड़, दवा समेत अन्य सामान बर्बाद हो गया। श्रमिक कार्यालय भवन के तीन कमरों में रखे चूड़ा, गुड़, पॉलीथिन, ओआरएस, जीवनरक्षक दवाइयां और लाखों के अन्य सामान पूरी तरह बर्बाद हो गये। चूड़ा इस कदर सड़ गया है कि वह जानवर के खाने लायक भी नहीं रहा। अंत में उसे नगर निगम के कर्मियों ने ट्रैक्टर पर लादकर कूड़ा के साथ उसे फेंक दिया।

बर्बाद हो चुके सामान को किया गया डंप
कर्मियों ने बताया कि वर्ष 2019 में इन सामानों की आपूर्ति नालंदा आपदा विभाग को की गयी थी। लेकिन, वितरण नहीं किया जा सका। गुरुवार को जिला आपदा प्रबंधन के आदेश पर नगर निगम के वाहन पर लोड कर पीड़ितों के लिए लाये गये सामान को शहर के बाहर फेंकवा दिया गया। नगर आयुक्त तरणजोत सिंह ने बताया कि आपदा विभाग के पत्र के अनुसार निगमकर्मियों ने बर्बाद हो चुके सामान को डंप कर दिया।

वेंडर को नहीं किया गया है भुगतान
आपदा प्रबंधन की प्रभारी पदाधिकारी उपासना सिंह ने बताया कि उक्त सभी सामग्री गया के वेंडर द्वारा वर्ष 2019 में आपूर्ति की गयी थी। उस समय ही वेंडर को कहा गया था कि जो सामान आपूर्ति की गयी है, वह इंसानों के खाने लायक नहीं है। वेंडर को सामान ले जाने के लिए अब तक आठ बार पत्राचार भी किया गया। फिर भी सामान वापस नहीं ले गया। अधिकारी का यह भी कहना है कि उन सामानों के लिए राशि का भुगतान वेंडर को नहीं किया गया है।

तीन साल तक नहीं ली गयी सुध
इंसानों के नहीं खाने लायक खाद्यान्न आपूर्ति किये गये सामानों की सुध लेने की फुर्सत प्रशासनिक अधिकारियों को तीन साल बाद मिली। हालांकि, राशि का भुगतान हुआ है अथवा नहीं, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन, लोगों ने सवाल उठाया है कि चूड़ा खाने लायक नहीं था। लेकिन, गुड़, ओआरएस, जीवनरक्षक दवाइयां, पॉलीथिन शीट और अन्य सामानों को इस तरह बर्बाद होने के लिए छोड़ देना कहां तक उचित है। क्या यह राज्य की क्षति नहीं है। गोदामों में बंद ओआरएस व जीवनरक्षक दवाइयां एक्सपायर हो गयीं। दवाइयों को अगर गरीबों के बीच वितरित कर दिया जाता तो यह स्थिति नहीं आती। यह तो लापरवाही की हद है।

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