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इंदिरा की गोद में बाघ का बच्चा, इस तस्वीर के बाद देश में बंद हो गई टाइगरों की हत्या

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नई दिल्ली

आपने कहीं सुना या पढ़ा होगा कि तस्वीरें बोलती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जिक्र होने पर 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े होने और इमर्जेंसी की चर्चा खूब होती है। एक दिन पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाघों की संख्या पर 2022 की रिपोर्ट जारी की तो इंदिरा गांधी की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। 50 साल पहले उन्होंने जंगल और जंगली जानवरों को बचाने के लिए जो पहल की थी, आज उसका परिणाम देश के सामने है। बाघों का कुनबा बढ़कर 3167 हो गया है। पीएम रविवार को कर्नाटक के बांदीपुर बाघ अभयारण्य पहुंचे थे। मोदी का पहनावा भी खास था। सिर पर हैट था। वह कैमरा और दूरबीन लेकर खुली जीप में घूमते दिखे। कांग्रेस ने याद दिलाया कि जिस प्रोजेक्ट टाइगर के 50 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है उसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शुरू किया था। कॉर्बेट नेशनल पार्क से इसकी शुरुआत हुई। वो साल था 1973। हालांकि इंदिरा उस समय जंगल में नहीं गई थी। तब देश में 9 टाइगर रिजर्व थे, जो आज बढ़कर 53 हो गए हैं। खैर, यहां क्रेडिट लेने की सियासी डिबेट से अलग हटकर उस तस्वीर की चर्चा करते हैं जो इस संबंध में शेयर की जाती रहती है। इसमें इंदिरा बाघ के एक बच्चे को छाती से लगाए दिखती हैं। एक मां के वात्सल्य प्रेम का अनुभव होता है। जी हां, जैसे कोई मां अपने बच्चे को दोनों हाथों से लिए रहती है, उसी तरह से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दिखाई देती हैं।

तब जंगल में खूनी खेल होता था
दरअसल 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं, उस समय जंगल खतरे में थे। जंगल काटे जा रहे थे। कई जगहों पर बंटवारे के शरणार्थियों को बसाने के लिए ऐसा किया जा रहा था। नए भारत की बुनियाद रखी जा रही थी तो बांध, माइन्स, रियल एस्टेट, इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए प्राकृतिक ठिकाने नष्ट हो रहे थे। जंगली जानवरों का शिकार हो रहा था। कोई भी गन लेकर जंगल में जानवरों का खून बहा देता था। हंटिंग गेम जारी था, ट्रॉफी बंटती थी। टाइगर की स्किन बिकती थी। दिल्ली के बाजार में भी जंगली जानवरों के अंग बिकते देखे गए। ऐसे हालात में इंदिरा गांधी ने दूर की सोची। भारत के जंगल को बचाने के लिए जंगली जानवरों को बचाना जरूरी था। पहले टाइगर शूटिंग पर बैन लगाया गया जबकि उस समय तर्क दिए जा रहे थे कि इससे विदेशी आय होती है।

1972 में टास्क फोर्स बनी। उस समय टाइगरों की गिनती की गई तो पता चला कि केवल 1800 बाघ बचे हैं। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई। वैसे, पीएम बनने से पहले से ही इंदिरा का वन्यजीवों से विशेष लगाव था। वह काफी कम उम्र में दिल्ली बर्ड क्लब की सदस्य बन गई थीं। गोद में टाइगर के बच्चे को लिए हुए इंदिरा की तस्वीर उनके 50वें जन्मदिन की है। इस तस्वीर में इंदिरा गांधी के चेहरे को जरा गौर से देखिए। एक अलग तरह का दुख और चिंता समझ में आएगी।

दरअसल, यह तस्वीर अपने आप में टाइगर को बचाने या कहिए उनके शिकार पर रोक की कहानी कहती है। भारतीय वन सेवा के राजस्थान कैडर के अधिकारी कैलाश सांखला हुआ करते थे। 1970-71 का वक्त था। बाघों की संख्या घट रही थी। रणथंभौर में एक बाघिन ने दो बच्चों को जन्म दिया। कुछ दिन बाद ही बाघिन की मौत हो गई।

सांखला बाघ के बच्चों को टोकरी में लेकर दिल्ली चले आए। वह टाइगर के बच्चों को लेकर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी से मिले। इंदिरा ने शावकों को गोद में उठा लिया। यह तस्वीर उसी समय की है। तब बाघिन के बारे में सुनकर इंदिरा गांधी को काफी दुख हुआ। सांखला ने पीएम को बताया कि जंगल बचाने के लिए बाघों को बचाना जरूरी है। इसके बाद ही टाइगर प्रोजेक्ट की घोषणा हुई। सांखला को ही इस प्रोजेक्ट की कमान सौंपी गई। आज इस प्रोजेक्ट की बदौलत देश में बाघों की संख्या 3100 से ज्यादा हो गई है।

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