BJP से 7 तो कांग्रेस से 12 बेटे बने झंडाबरदार, गुजरात चुनाव के रण में अबकी बार फिर ‘परिवार’

अहमदाबाद

हर विधानसभा चुनाव में पार्टियां परिवारवाद पर प्रहार करती हैं। दावा किया जाता है कि उनकी ओर से वंशवाद को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव से अभी जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, उससे साफ है कि परिवारवाद की जड़ें पॉलिटिक्स में गहरी हैं। बीजेपी और कांग्रेस जैसी मुख्य पार्टियों ने जिन प्रत्याशियों को टिकट दिया है, उनमें से 21 उम्मीदवार राजनेताओं के पुत्र हैं।

बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए तमाम राजनैतिक परिवारों के लोगों को मौका दिया है। बीजेपी ने ऐसे सात उम्मीदवारों पर दांव खेला है, जबकि कांग्रेस ने 13 को टिकट दिया है। ये उम्मीदवार सिटिंग या पूर्व एमएलए के पुत्र हैं। इस लिस्ट में समाजवादी पार्टी भी है, जिस पर यूपी में अकसर परिवारवाद का आरोप लगता है। कुतियाना विधानसभा सीट से एसपी ने ‘गॉडमदर’ नाम से चर्चित पूर्व एमएलए संतोखबेन जडेजा के बेटे कांधल जडेजा को टिकट दिया है।

पिता की विरासत और जिताऊ क्षमता बना पैमाना
इन उम्मीदवारों का टिकट तय करने में उनके पिता की सियासी विरासत और जिताऊ क्षमता मुख्य वजह रही। गुजरात के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों को भी कांग्रेस से टिकट मिला है। अमर सिंह चौधरी 1985 से 1989 तक गुजरात के सीएम रहे थे। उनके पुत्र डॉ. तुषार चौधरी को टिकट मिला है। इसी तरह 1996 से 1997 तक गुजरात के सीएम रहे शंकर सिंह वाघेला के बेटे महेंद्र सिंह वाघेला को भी कांग्रेस ने टिकट दिया है।

‘बचपन से ही प्रचार में जाया करता था’
तुषार चौधरी कहते हैं, ‘मेरे पिता खेड़ब्रह्मा से तीन बार विधायक रह चुके थे। मैं बचपन से ही चुनाव प्रचार के दौरान उनके साथ जाया करता था।’ महेंद्र सिंह वाघेला बायड़ सीट पर कब्जे के लिए मैदान में हैं। वह कहते हैं, ‘जिस सीट से मैं चुनाव लड़ रहा हूं, वहां की जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से मेरा गहरा नाता है।’

बीजेपी ने पूर्व कैबिनेट मंत्री अशोक भट्ट के बेटे भूषण भट्ट को भी चुनाव में टिकट दिया है। इसके अलावा एक और पूर्व कैबिनेट मंत्री विट्ठल रादडिया के बेटे जयेश रादडिया को मौका मिला है। भूषण बीजेपी के टिकट पर जमालपुर-खाडिया और जयेश जेतपुर सीट से लड़ रहे हैं।

कांग्रेस से आए 3 नेताओं के बेटों को बीजेपी टिकट
बीजेपी ने सियासी परिवारों से ताल्लुक रखने वाले सात में से जिन तीन लोगों को टिकट दिया है, वे कांग्रेस से आए नेताओं के पुत्र हैं। इनमें से कुछ के दल-बदल की सबसे बड़ी वजह उनके बेटों को टिकट का भरोसा मिलना भी रहा। सेंट्रल गुजरात से आने वाले दस बार के विधायक मोहन सिंह राठवा दशकों का कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी में आ गए। उन्हें आशंका थी कि उनके बेटे राजेंद्र सिंह को छोटा उदेपर सीट से टिकट नहीं मिल पाएगा। प्रत्याशियों के नाम के ऐलान से चंद दिन पहले ही मोहन सिंह राठवा ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का झंडा थाम लिया।

छोटा उदेपुर से साणंद तक परिवार का परचम
राजेंद्र सिंह राठवा अब छोटा उदेपुर सीट पर बीजेपी का चेहरा हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस के संग्राम सिंह से है, जो एक और सीनियर आदिवासी नेता और पूर्व रेल मंत्री नारन राठवा के बेटे हैं। साणंद से बीजेपी ने कनु मकवाना को उतारा है। वह भी कांग्रेस से बीजेपी में आए करम सिंह मकवाना के पुत्र हैं। करम सिंह ने साणंद से कांग्रेस के टिकट पर 2012 और 2017 में जीत हासिल की थी। इसके बाद वह बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी ने कनु को उनके पिता की सीट से उम्मीदवार बनाया और वो जीत गए। एक बार फिर कनु यहां से लड़ रहे हैं।

योगेंद्र परमार कांग्रेस से बीजेपी में आए राम सिंह परमार के पुत्र हैं। वह थासरा सीट से बीजेपी उम्मीदवार हैं। 2017 में कांग्रेस छोड़ने के बाद बीजेपी में आने पर राम सिंह को टिकट मिला था। चुनाव में राम सिंह हार गए थे, लेकिन इस बार उनके बेटे योगेंद्र को मौका मिला है। कांग्रेस भी वंशवाद के झंडाबरदारों को मौका देने में पीछे नहीं है। पूर्व कांग्रेस एमएलए गोवाभाई राबारी के बेटे संजय राबारी को पार्टी ने डीसा सीट से टिकट दिया है। उनके पिता इसी सीट से दो बार विधायक रह चुके हैं।

‘मेरे पिता के अच्छे काम मेरी मदद करेंगे’
दानिलिमडा से कांग्रेस विधायक शैलेश परमार अपनी सीट बचाने की जंग लड़ रहे हैं। वह चार बार के विधायक मनुभाई परमार के पुत्र हैं। शैलेश कहते हैं, ‘मेरा पूरा परिवार राजनीति से जुड़ा है और मैं बचपन से ही इसका हिस्सा हूं। मेरे पिता के अच्छे काम मेरे पहले चुनाव में काफी मदद करेंगे और उनकी विरासत को बरकरार रखने का प्रयास करूंगा।’ बेटों की भीड़ में चोटिला के सात बार के विधायक करम सिंह मकवाना की बेटी कल्पना धारिया भी हैं। करम सिंह कांग्रेस और जनता दल के साथ ही निर्दलीय भी चुनाव जीत चुके हैं। कल्पना को लिंबड़ी से कांग्रेस का टिकट मिला है।

About bheldn

Check Also

मुगलों के ताजमहल से लड़ने को तैयार है आगरा की ये सफेद इमारत, 104 साल में हुई तैयार, अब यहां का भी लगेगा टिकट

आगरा का नाम आते ही, जहन में सबसे पहला नाम ताजमहल का आता है, और …