थ्रिफ्ट चुनाव में युवा कर्मचारी जागे,6 पुराने डायरेक्टरों को दिखाया बाहर का रास्ता

-दमदार पैनल भी नहीं दिखा पाई दम
-सत्ताधारी पैनल को उठाना पड़ा भारी नुकसान
-जीत का दावा करने वाले कई नेताओं को करना पड़ा हार का सामना

भोपाल

भेल की बीएचईई थ्रिफ्ट एंड के्रडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी भले ही संपन्न हो गये हो लेकिन इसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिये हैं । 4700 मेम्बर वाली सवा सौ करोड़ की संस्था सिर्फ 10 माह विवादों में रहने के कारण मतदाताओं में नेताओं को बहुत कुछ सिखा दिया । यही नहीं कभी जो सत्ताधारी संचालक मंडल के विरोधी रहे वह एन चुनाव के वक्त हाथ मिला बैठे। इस चुनाव में जहां अधिकारी अपने वाटों का न के बराबर इस्तेमाल करते थे इस बार उन्होंने ही नहीं बल्कि युवा मतदाताओं ने भी जमकर मतदान में भाग लिया । युवा कर्मचारी मतदाता न सिर्फ ज्यादा बल्कि विवादित 6 डायरेक्टरों को बाहर का रास्ता दिखा दिया ।

दमदार पैनल कोई दम नहीं दिखा पाई तो सत्ताधारी पैनल से सिर्फ अध्यक्ष ही अपनी इज्जत बचाने में कामयाब हो पाये । जो अपने आप को टे्रड यूनियन का नेता मानकर चुनाव लड़े थे उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा । आने वाले समय में इस संस्था में होने वाले चुनाव के कई संकेत युवा कर्मचारियों ने इस चुनाव मे दिये । कुछ उम्मीदवारों ने तो मतदाताओं से यह वादा कर चुनाव लड़ा था कि वह जीतने के बाद पिछली बार की तरह इस बार संस्था को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देंगे लेकिन यह वादा भूलकर इसे फिर से राजनीति का अखाड़ा बना दिया । उनके समर्थक ही सिर्फ पद हथियाने के लिये दूसरों से हाथ मिला बैठे । ऐेसे में आगे संस्था का क्या होगा यह देखना बाकी है ।

भेल पारदर्शी पैनल : इसी नाम से पैनल बनाकर जिन लोगों ने चुनाव लड़ा उनके 7 डायरेक्टर न केवल चुने गये बल्कि थ्रिफ्ट की सत्ता भी पा गये लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब इन दोनों में दो फाड़ हो गये और यहीं से संस्था में राजनीति व विवाद लगातार चलते रहे । इस चुनाव में इस पैनल से कमलेश नागपुरे के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया । जिसमें सिर्फ श्री नागपुरे को छोड़कर डायरेक्टर गौतम मोरे,भीम धु्रवे,राजकुमारी सैनी को हार का सामना करना पड़ा ।

प्रगतिशील पैनल : पिछले चुनाव में पारदर्शी पैनल के बैनर तले चुनाव लड़े बसंत कुमार ने प्रगतिशील नई पैनल बनाकर पूर्व डायरेक्टर रामनारायण गिरी के साथ चुनाव लड़े इसमें भी पूर्व डायरेक्टर सत्येन्द्र कुमार को हार का सामना करना पड़ा लेकिन युवा पीढ़ी के 4 उम्मीदवार जीतने के कारण पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया । इसलिये आदर्श पैनल के एक उम्मीदवार को अपने पक्ष में कर थ्रिफ्ट में काबिल हो गये । जो युवा कर्मचारी जीते उन्हें युवाओं के कम लेकिन अधिकारियों का समर्थन ज्यादा मिला । यही नहीं गिरी व एक अन्य उम्मीदवार को बराबर-बराबर वोट मिलने के कारण गिरी को हार का सामना करना पड़ा ।

सत्यमेव जयते पैनल : युवाओं का भारी समर्थन प्राप्त बड़े नेता के सताये हुये कर्मचारियों सत्यमेव जयते पैनल बनाकर थ्रिफ्ट का चुनाव पूरी दमदारी से लड़े। ऐसा कहा जा रहा था कि इस पैनल से कोई भी नहीं जीतेगा लेकिन इनके 5 उम्मीदवरों के नामांकन पत्र निरस्त होने क बाद भी उनके 11 में से 9 उम्मीदवार ही चुनाव मैदान में उतरे इनमें से 3 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की । यदि नामांकन निरस्त नहीं होते तो थ्रिफ्ट का नजारा ही कुछ और होता । साफ जाहिर है कि बिना संसाधन के चुनाव लड़ी इस पैनल को युवा कर्मचारियों ने ज्यादा पसंद किया ।

आदर्श पैनल : पिछले चुनाव में सत्ता का स्वाद चखने वाले पूर्व डायरेक्टर संजय गुप्ता को भी इस पैनल से हार का सामना करना पड़ा जबकि इस पैनल में काफी दम दिखाई दे रहा था लेकिन युवा कर्मचारियों की नाराजगी ने पैनल के मुखिया राजेश शुक्ला को छोड़कर 10 उम्मीदवारों को हरा दिया । श्री शुक्ला भी हारते-हारते बचे टाई के बाद उन्हें डायरेक्टर बनने का मौका दिया । अंत में अध्यक्ष पद के चुनाव के समय उन्होंने प्रगतिशील पैनल को समर्थन देकर उपाध्यक्ष पद हासिल कर लिया । ऐसा अंदाजा चुनाव परिणाम के बाद लोग पहले से ही लगा रहे थे ।

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