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सामने बेटे संजय का शव और ऐसे में इंदिरा ने चंद्रशेखर से जो कहा वह सुन स्तब्ध रह गए अटल

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नई दिल्ली

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की हिम्मत की हमेशा दाद दिया करते थे। हालांकि इंदिरा के आपातकाल लगाने के फैसले के वो कटु आलोचक भी रहे थे। वाजपेयी ने 1980 में इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी के निधन के बाद इंदिरा की एक कहानी को कलमबद्ध किया था। इस लेख में उन्होंने पूर्व पीएम की हिम्मत और देश के प्रति लगन का जिक्र किया था। अटल ने लिखा था कि किसी का जवान बेटा मौत के आगोश में हो और उसकी मां देश की बारे में सोच रही हो, ऐसा कभी देखने को नहीं मिला। दिनमान में 27 अक्टूबर-2 नवबंर 1985 के अंक में अटल का यह लेख छपा था। पढ़िए..

12 जून, 1980
टेलीफोन की घंटी बजी, उधर से आवाज आई, मैं आडवाणी बोल रहा हूं। संजय गांधी विमान दुर्घटना में घायल हो गए हैं। उन्हें डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया है। हमे चलना चाहिए। मैंने कहा, आइये, यहां से साथ चलेंगे। जब हम अस्पताल पहुंचे तो काफी भीड़ इकट्ठी हो गई ती। बाहर आने वालों ने बताया कि संजय की मृत्यु हो चुकी है। हम दोनों उस कमरे की ओर बढ़े जहां संजय का शव रखा था। श्री धवन (आर के धवन) ने भीड़ में से रास्ता बनाया। दरवाजा खोलकर भीतर गए तो सामने इंदिरा गांधी खड़ी थीं। उनकी आंखों पर काला चश्मा चढ़ा था। मैंने उनसे कहा कि इस समय आपको बड़ी हिम्मत से काम लेना है। उन्होंने मुंह से तो कुछ नहीं कहा, किंतु चश्मे के भीतर से मुझे कुछ ऐसी नजर से देखा कि मैं एक क्षण के लिए सिकुड़ गया। मुझे लगा कि वे बिना कहे यह कह रही हैं कि हिम्मत तो मुझे घुट्टी में मिली है। आप मुझे हिम्मत का उपदेश देने वाले कौन होते हैं?

बाहर निकले तो चंद्रशेखर जी से मुलाकात हो गई। उन्होंने इंदिरा के साथ अपनी बातचीत के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि जब वे बाहर निकलने लगे तो इंदिरा ने उन्हें एक तरफ ले जाकर कहा है कि वे काफी दिनों से उनसे बात करना चाहती थीं, किंतु मौका नहीं मिला। असम की समस्या का हल करने में अब और अधिक देर नहीं होनी चाहिए।

चंद्रशेखर की बात सुन मैं विचार में डूब गया। जिस बेटे ने मुसीबत में साथ दिया, जिसने 1977 की पराजय को विजय में बदलने के लिए सब कुछ किया, जिस पर भविष्य की आशाएं लगी थीं, वह भरी जवानी में एक विमान दुर्घटना में संसार से उठ गया। उसका क्षत-विक्षत शरीर मृत अवस्था में, अस्पताल में, बिस्तर पर पड़ा है और इंदिरा हैं कि असम की चिंता कर रही हैं। उसके बारे में प्रतिपक्ष से बात कर रही हैं। मैं सोचने लगा कि आखिर इंदिरा जी हैं क्या? उनका वास्तविक रूप क्या है? वे मानवी हैं या देवी या पाषाणी? या मात्र राजनेत्री, सिर्फ एक राजनेत्री।

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