ममता के साथ अखिलेश की यह तस्‍वीर देख आज क्‍यों दौड़ गई होगी BJP में खुशी की लहर?

नई दिल्‍ली

समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव ने शुक्रवार को कोलकाता में बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से मुलाकात की। इस मुलाकात की तस्‍वीरें बहुत कुछ कहती हैं। ये दोनों नेताओं के बीच बनती युगलबंदी को दर्शाती हैं। मुलाकात की इन तस्‍वीरों में अखिलेश और ममता की बनती केमिस्‍ट्री साफ देखी जा सकती है। कोई खुश हो या नहीं। भारतीय जनता (BJP) के खेमें में इन्‍हें देखकर जरूर खुशी की लहर दौड़ गई होगी। वह ताड़ चुकी होगी कि विपक्ष की एकजुटता का सपना सिर्फ कोरी गप्‍प है। इसमें आगे और खींचतान बढ़ेगी। तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता और सपा के मुखिया अखिलेश कांग्रेस से हाथ जलाकर बैठे हैं।

दोनों के एक साथ आने का मतलब है कि कांग्रेस के बैनर तले ये अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। यानी कम से कम एक और फ्रंट बनना करीब-करीब तय है। इनमें से एक फ्रंट का नेतृत्‍व कांग्रेस और दूसरे का कोई और नेता कर सकता है। लेकिन, वो दूसरा कौन होगा? ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, एके स्‍टालिन… फेहरिस्‍त लंबी है। हर कोई एकजुट विपक्ष की बात कर रहा है। लेकिन, सभी विपक्षी दलों में आपस में ही कुछ न कुछ खिचड़ी पक रही है। यह विपक्ष को एक नहीं होने दे रही है। शायद ऐसा हो भी नहीं पाएगा। एक बात और साफ है। बीजेपी आज इतनी मजबूत है कि एकजुट विपक्ष के लिए भी उसके सामने चुनौती पेश करना मुश्‍किल है। बिखरे विपक्ष की तो बिसात ही क्‍या है।

ममता से अखिलेश का मिलना तय था। दरअसल, सपा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक 18 मार्च से कोलकाता में आयोजित होगी। इसमें इस साल होने वाले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के लिए स्‍ट्रैटेजी बनाई जाएगी। फोकस में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव भी होंगे। ममता और अखिलेश का मिलना ‘शिष्‍टाचार भेंट’ तो बिल्‍कुल नहीं था। यह बनती-बिगड़ती तस्‍वीर की झलक है। बीजेपी को चुनौती देने के लिए आगे विपक्ष किस तरह का रूप लेगा, इससे इसका कुछ-कुछ अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है। हालांकि, एक बात यह तय है कि मुकाबला बीजेपी बनाम ‘ऑल’ नहीं होगा। एक मोर्चा वो होगा जिसका नेतृत्‍व कांग्रेस कर सकती है। दूसरा वो जिसकी अगुआई किसी दूसरे दल का नेता करेगा। मुश्किल यह है कि अभी यह दूसरा फिक्‍स नहीं है।

ममता और अख‍िलेश की बन चुकी है कांग्रेस से दूरी
ममता और अखिलेश दोनों की कांग्रेस से स्‍पष्‍ट दूरी बन चुकी है। यह सही है कि राजनीति में दोस्‍ती और दुश्‍मनी का कुछ पता नहीं चलता है। लेकिन, ममता का ममला थोड़ा क्‍लीयर दिख रहा है। खासतौर से पिछले कुछ समय में जिस तरह से वह कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर हमलावर हैं, वह उनका इरादा साफ कर देता है। एक नहीं, वह कई बार कह चुकी हैं कि कांग्रेस विपक्ष का नेतृत्‍व नहीं कर सकती है। राहुल गांधी की नेतृत्‍व क्षमता पर भी ममता सवाल उठाती रही हैं। अखिलेश का भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का एक्‍सपीयंस खट्टा ही रहा है। इस लिहाज से इन दोनों का नजदीक आना स्‍वाभाविक है।

विपक्ष में साफ द‍िख रही है खींचतान…
लोकसभा चुनाव अगले साल होने हैं। विपक्ष ‘फिक्‍स’ नहीं हो पा रहा है। खींचतान हर तरफ दिख रही है। विपक्ष के तमाम कद्दावर नेता एकजुट होने की सिर्फ बात ही कर रहे हैं। लेकिन, सबकी अपनी ढपली अपना राग है। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एके स्‍टालिन, केसीआर वो कुछ नाम हैं जो एकजुटता की कवायद को आगे बढ़ाने में लगे हैं। ममता को लेफ्ट बर्दाश्‍त नहीं। कांग्रेस का लेफ्ट की ओर झुकाव है। बीच में केजरीवाल भी हैं। दिल्‍ली के बाद पंजाब में आप की सरकार बनाने के बाद वह भी विपक्ष की अगुआई करने के बड़े कंटेंडर बने हुए हैं। सबकुछ खिचड़ी है। विपक्ष भी इस बात को अच्‍छी तरह समझ रहा है। यह कन्‍फ्यूजन कई मोर्चों को जन्‍म दे सकता है। बीजेपी बस यही चाहती है।

व‍िपक्ष की उलझन खोल रही है बीजेपी की जीत का रास्‍ता…
विपक्ष की उलझन ही बीजेपी की जीत का रास्‍ता खोल देगी। 2014 के बाद से यही होता आ रहा है। अपनी ढपली अपने राग ने बीजेपी को लगातार बढ़ने और फलने-फूलने का मौका दिया है। इसके लिए बीजेपी के रणनीतिकारों की भी सराहना करनी होगी। उन्‍होंने एक भी मौका नहीं गंवाया है। उदाहरण के लिए पूर्वोत्‍तर राज्‍यों को ही ले सकते हैं। कुछ साल पहले तक जहां बीजेपी नदारद थी। आज पूरा पूर्वोत्‍तर भगवामय बन चुका है। अपने पार्टनर डिसाइड करने में देरी ने विपक्ष को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचाया है। बीजेपी लगातार इसका फायदा उठाती रही है। अब तो ‘मल्‍टी’ मोर्चों की सूरत साफ बनती दिख रही है। इससे बीजेपी के रणनीतिकारों का काम और आसान हो जाएगा।

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