जिस गुजरात में ‘चार दुकानें’ नहीं बंद करा सकती थी , वहां कांग्रेस ने पूरा शहर बंद करा दिया , राजकोट बंद के मायने समझिए

अहमदाबाद:

गुजरात पिछले तीन दशक से बीजेपी के लिए अभेद्य दुर्ग बना हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनावों को छोड़ दे तो बीजेपी को गुजरात में कभी ज्यादा मुश्किल नहीं आई, 25 जून को दिल्ली में 18वीं लोकसभा के पहले सत्र की गहमागहमी के बीच यहां से 1200 किलोमीटर दूर राजकोट में अभूतपूर्व बंद रहा। टीआरपी गेम जोन हादसे की मासिक बरसी पर बुलाए गए बंद का राजकोट वासियों से समर्थन किया। राजकोट वह शहर है जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीति में पदार्पण के लिए जाना जाता है। उस राजकोट में बंद का व्यापक असर रहा। कांग्रेस के बंद के सफल होने के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या आने वाले दिनों के बीजेपी के लिए खतरा बढ़ने वाला है? क्योंकि इस बंद में लोगों ने अपने मर्जी से दुकानें बंद रखीं। कुछ स्थानों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पुलिस से नोकझोंक और झड़प हुई, लेकिन हिंसा और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी।

बंद रहा रंगीला राजकोट
राजकोट की बात करें तो इस सौराष्ट्र की राजधानी माना जाता है। उत्सव और उमंग में डूबे रहने वाले इस शहर को रंगीला माना जाता है। इसलिए इसे रंगीला राजकोट भी कहते है, लेकिन पिछले महीने की 25 तारीख को टीआरपी गेम जाेन में लगी भीषण आग और फिर उसे 27 लोगों के जिंदा जलने के बाद इस शहर के लोगों में गुस्सा है। नाराजगी है। यही वजह है कि कांग्रेस ने जब मासिक बरसी पर बंद रखा तो बीजेपी से संबद्धता रखने वाले व्यापारी भी इस बंद के खिलाफ नहीं जा पाए। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि राजकोट बंद से जो संदेश निकला है क्या बीजेपी उसे सुनेगी? सूरत के तक्षशिला, मोरबी के ब्रिज हादसे और फिर वडोदरा में हरणी कांंड के हुए गेम जोन हादसे ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को सवालों के घेरे में खड़ा किया है।

बैकफुट पर रही बीजेपी
अपने सबसे मजबूत गढ़ में फ्रंटफुट पर रहने वाली बीजेपी कांग्रेस के बंद बुलाने के दांव पर चारों खाने चित नजर आई। पार्टी के तमाम नेताओं की बोलती बंद रही। कांग्रेस पार्टी ने पीड़ितों को इंसाफ दिलाने के लिए यह बंद बुलाया। कांग्रेस का कहना है कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखाया हो रहा है। एसआईटी रिपोर्ट में लीपापोती की जा रही है। कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी नेताओं ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात तक नहीं की। इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी से कई चूकें हुई है। ऐसे में कहा जा रहा है कि अब जब राज्य में कुछ समय बाद पंचायत के चुनाव होंगे तो क्या इन हादसों का असर पड़ सकता है?

कार्रवाई से लोग नहीं हैं संतुष्ट
सौराष्ट्र हेडलाइन के संपादक जगदीश मेहता कहते हैं राजकोट पिछले 30 साल से बीजेपी का गढ़ है। यहां पर कांग्रेस का बंद सफल होने का बड़े संदेश है। बंद कल्पना से भी आगे रहा। लोगों ने समर्थन दिया। इसका मतलब है कि लोग अभी तक टीआरपी गेम जोन कांड में सरकार की तरफ से जो भी कार्रवाई की गई है। उससे संतुष्ट नहीं है। मेहता कहते हैं कि बंद के ऐलान से लेकर बंद के बाद तक कांग्रेस जहां फ्रंटफुट पर रही तो वहीं बीजेपी बैकफुट पर रही। मेहता कहते हैं कि लोग बड़ी कार्रवाई चाहते हैं अगर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार ऐसा करने में असफल रहती है तो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए स्पेस बनेगा। जो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी होगा। राजकोट के नगर निगम पर बीजेपी काबिज है। ऐसे में वहां के भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदारी उसकी की बनती है।

सरकार ने बनाई थी SIT
25 मई को हुए इस गेम जोन हादसे की जांच के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी गठित की थी। एसआईटी ने 21 जून को अपनी रिपोर्ट गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी को सौंपी थी। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी सुभाष त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली एसआईटी ने 100 पन्नों की अपनी अंतरिम रिपोर्ट में गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33 में कुछ बदलावों का सुझाव दिया है। संबंधित धारा स्थानीय पुलिस को ऐसे गेम जोन को विभिन्न लाइसेंस प्रदान करने का अधिकार देती है। एसआईटी की रिपोर्ट से पहले गुजरात हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सरकार से पूछा था कि टीआरपी गेम ज़ोन के उद्घाटन समारोह में शामिल होने वाले इन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इन आरोपों पर एसआईटी का कहना है कि ये अधिकारी इसके खुलने के करीब एक साल बाद वहां गए थे। गेम जोन में 25 मई को लगी भीषण आग में बच्चों सहित 27 लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस की जांच में पता चला कि गेम जोन राजकोट नगर निगम के अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए बिना चल रहा था। पुलिस ने घटना के सिलसिले में अब तक गेम जोन के पांच मालिकों और छह सरकारी अधिकारियों को गिरफ्तार किया है।

क्यों है बीजेपी के लिए बड़ी चिंता?
गुजरात में कांग्रेस की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस के पास विधानसभा में सिर्फ 13 विधायक हैं। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 10 साल के सूखे के बाद एक सीट जीती है, लेकिन राजकोट में सफल बंद के बाद यह चर्चा हो रही है कि अगर पार्टी इसी तरह से जमीनी स्तर पर सक्रिय हुई तो बीजेपी को दिक्कत हो सकती है। क्योंकि जिस कांग्रेस के पास अभी तक चार दुकानें बंद कराने की हिम्मत नहीं थी उसे कांग्रेस पार्टी ने तय रणनीति के अनुसार राजकोट बंद करा चुनौती पेश कर दी है? अब देखना यह है कि पंचायत से पार्लिमेंट तक काबिज बीजेपी कैसे निपटती है? फिलहाल पीएम मोदी के पहले निर्वाचन क्षेत्र रहे राजकोट से कांग्रेस वापसी की राह खोल ली है?

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