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आंखों में दर्द लिए चीखती रही मां, घायल शावकों को बचाने के लिए दौड़ी रेलवे की एक बोगी वाली ट्रेन

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भोपाल:

जंगल से गुजर रही रेल से टकराकर एक शावक की मौत की तस्वीर ने पूरे देश को झकझोर दिया। उसकी छोटी-छोटी आंखें हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं। उसके नन्हे-नन्हे पंजे अब कभी जंगल की मिट्टी को महसूस नहीं कर पाएंगे। इस दुखद घटना ने मानव और प्रकृति के बीच संघर्ष की कहानियों में एक पन्ना और जोड़ दिया।

प्रकृति और प्रगति के बीच की जंग
हरा-भरा जंगल और उस जंगल के बीच से गुजरती रेल की पटरी, न सिर्फ वन्यजीवों के लिए खतरनाक है, बल्कि मानवीय जीवन के द्रष्टिकोंण से भी ये ठीक नहीं है। न तो ये देश में ऐसा पहला मामला है और न आखिरी। तेजी से बढ़ती आबादी और विकास की अंधी दौड़ ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हमारे जंगल, जो कभी शांति और समृद्धि का प्रतीक थे, अब खतरे में हैं। ये जंगल हमारे लिए सिर्फ लकड़ी या खनिजों का भंडार नहीं हैं, बल्कि अनगिनत जीवों के घर हैं। बाघ, जिसे हम गर्व से राष्ट्रीय पशु कहते हैं, वो अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है।

बाघिन की दर्द भरी आंखें
उस दिन जब बाघिन ने अपने शावक को खोया तो उसकी चीखें पूरे जंगल में गूंज रही थीं। उसने तमाम प्रयास किए लेकिन वह अपने बच्चे को बचा नहीं पाई। उसकी दर्द भरी आंखों ने इंसान पर क्रूर होने का आरोप लगाया। यह केवल एक मां की नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति की पुकार थी। उसकी आंखों के आगे उसका एक बच्चा मरा हुआ था और दो घायल पड़े थे। कोई कल्पना कर सकता है कि उस बाघिन पर क्या बीत रही होगी। हालांकि उसने हिम्मत नहीं हारी, वो बैचेन थी। कभी शावकों के पास बैठती, कभी उन्हें चाटने लगती फिर दहाड़ने लगती। उसकी दहाड़ से पूरा जंगल गूंज उठता, मानो उसके दुख में अपनी सहभागिता जता रहा हो। बाघिन की आंखों में पीड़ा का वो रुप था कि रेस्क्यू करने गई टीम को भी बाघिन के जाने का इंतजार करना ठीक लगा।

अगले दिन पहुंची रेस्क्यू टीम
बुधवार को वनकर्मियों ने अंततः उन दो शावकों को बचा लिया। रेलवे ने इस अवसर पर पहली बार एक विशेष बोगी ट्रेन का इंतजाम किया जिससे कि इन गंभीर घायल बच्चों को 55 किलोमीटर दूर भोपाल ले जाया जा सके। दोनों बच्चे लगभग नौ महीने के हैं और उनको कई स्पाइनल चोटें आई हैं। उपचार की संभावनाएं कम हैं। वन विभाग की टीमें वन विहार नेशनल पार्क और सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व से पहुंची थीं।

रेलवे ने किया सहयोग
बड़ा सवाल यह था कि इन गंभीर घायल बच्चों को भोपाल कैसे ले जाएं? पश्चिम मध्य रेलवे ने उनके बचाव के लिए एक विशेष ट्रेन का इंतजाम किया और यह ट्रेन लगभग दोपहर 3 बजे वहां पहुंची। बच्चों को बोगी में लोड किया गया और रानी कमलापति रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया गया, जहां से उन्हें लगभग शाम 5.30 बजे वन विहार के लिए ले जाया गया था।

कैसे हुआ था एक्सीडेंट
माना जाता है कि ट्रेन के रेलट्रैक्स पार करते समय ये बच्चे अपनी मां का पीछा कर रहे थे, उसी समय ट्रेन ने उन्हें कुचल दिया। एक बच्चे की मौके पर मौत हो गई थी, जबकि दो मादा गंभीर रूप से घायल थीं और सूखे नाले में गिरी थीं। एक अधिकारी ने बताया कि, ‘बच्चे गंभीर स्थिति में हैं, उनके पिछले पैरों में चोटें हैं। जब बेहोशी की दवा का असर खत्म होगा, तब उनकी स्थिति और स्थिर हो जाएगी।

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