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‘अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजने के बजाए हिरासत में क्यों रखा जा रहा’, SC का मोदी सरकार से सवाल

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नई दिल्ली,

अवैध बांग्लादेशियों से जुड़े मामले पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने बीजेपी नीत केंद्र सरकार से पूछा कि सैकड़ों अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को उनके मूल देश में वापस भेजने के बजाय उन्हें अनिश्चित काल के लिए भारत के हिरासत केंद्रों में रखने का क्या उद्देश्य है. अब इस मामले में अगली सुनवाई 6 फरवरी 2025 को होगी.

इस मामले पर जस्टिस जे.बी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि बांग्लादेश के किसी अवैध आप्रवासी को विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत गिरफ्तार किया गया है और दोषी ठहराया गया है. तो उन्हें सजा की अवधि के बाद तुरंत अपने मूल देश भेज दिया जाना चाहिए. क्या उन्हें भारत में निरुद्ध केंद्रों/सुधार गृहों में अनिश्चित अवधि के लिए रखा जाना चाहिए.

‘अवैध बांग्लादेशियों का दें सटीक आंकड़ा’
पीठ ने ये भी कहा कि सुधार घरों में लगभग 850 अवैध प्रवासियों को हिरासत में लिया गया है. साथ ही पीठ ने केंद्र से अवैध प्रवासियों का सटीक आंकड़ा भी पेश करने को कहा है. अवैध प्रवारियों को दोषी ठहराए जाने और विदेशी अधिनियम के तहत पूरी सजा सुनाए जाने के बाद विभिन्न निरुद्ध शिविरों/सुधार घरों में कितने अवैध आप्रवासी हैं?

क्यों नहीं हो रहा कानून का पालन?
पीठ ने यह भी कहा कि हम उत्तरदाताओं से समझना चाहते हैं कि एक बार बांग्लादेश से एक अवैध आप्रवासी को कथित अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, यह स्थापित नहीं है कि वह भारत का नागरिक नहीं है. ऐसे सैकड़ों अवैध प्रवासियों को अनिश्चित अवधि के लिए हिरासत शिविरों/सुधारक घरों में रखने का क्या विचार है?भारत सरकार द्वारा 25 नवंबर, 2009 को जारी परिपत्र के खंड 2 (v) के अनुसार, 30 दिनों की अवधि के अंदर निर्वासन, सत्यापन आदि की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. हम ये जानना चाहते हैं कि इस कानून का सख्ती से अनुपालन क्यों नहीं किया जा रहा है.

‘याचिकाकर्ता ने कलकत्ता HC को लिखा पत्र’
अदालत ने 2013 (माजा दारुवाला बनाम भारत संघ) के मामले पर विचार करते हुए ये टिप्पणियां कीं, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर दिया गया था. साल 2011 में याचिकाकर्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा, जिसमें बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला गया था. जिन्हें विदेशी अधिनियम के तहत अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने के बाद सुधारक घरों तक ही सीमित रखा जा रहा है.

पत्र में कहा गया है कि सजा सुनाए जाने के बाद भी आप्रवासियों को अपने ही देश में निर्वासित करने के बजाय पश्चिम बंगाल राज्य के सुधार गृहों में हिरासत में रखा जा रहा है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस पर पत्र का स्वतः संज्ञान लिया. साल 2013 में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था.

असम को लेकर भी पूछा सवाल
वहीं, पिछले हफ्ते (30 जनवरी) हुई सुनवाई में अदालत ने भारत संघ से यह भी जानना चाहा कि पश्चिम बंगाल राज्य से इस प्रकार के मामलों में क्या करने की उम्मीद थी. गौरतलब है कि न्यायमूर्ति ओका की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने असम में विदेशियों के हिरासत केंद्रों में अवैध प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत को लेकर केंद्र सरकार से भी सवाल किया है.

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