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कोरोना वायरस महामारी के दौरान बढ़ीं इंसानी याददाश्त की समस्याएं, ताजा शोध में खुलासा

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सेंट जोन्स (कनाडा)

कोविड-19 महामारी की शुरुआत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है जिससे स्वास्थ्य प्रणाली पर अत्यधिक बोझ पड़ा है। हमारे दैनिक जीवन में अचानक से आमूल-चूल बदलाव आया है। सहज रूप से, यह बात तर्कसंगत लगती है कि महामारी से जो हलचल पैदा हुई, उससे हमारी जिंदगियों में उस समय के अनेक यादगार क्षण बन गये। कई लोग कहते हैं कि लॉकडाउन में उनकी खराब स्मृतियां रहीं। वहीं, हममें से कई लोगों ने सामाजिक अलगाव के महीनों के दौरान भुलक्कड़ होने का एहसास किया। यादों को लेकर इस तरह के अनुभवों के वास्तव में क्या कारण रहे यह अभी साफ नहीं है, लेकिन संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के भलीभांति स्थापित सिद्धांत इस स्थिति को अच्छी तरह बयां कर सकते हैं।

जानें समयांतर (ट्रांजिशन) का सिद्धांत
अपनेपन की भावना: आत्मकथात्मक स्मृतियां घटनाओं और सामान्य ज्ञान की हमारी यादों से जोड़ती हैं जो हमारी स्वयं की भावना बनाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि आत्मकथात्मक स्मृति में शोध से पता चलता है कि 30 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों को किशोरावस्था के बाद के दिनों और बालिग होने की आयु के शुरुआती दिनों की घटनाएं अनुपानहीन तरीके से बड़ी संख्या में याद हैं। इस सुदृढ़ प्रभाव को स्मृति उभार (रेमनिसन्स बंप) के रूप में जाना जाता है। समयांतर (ट्रांजिशन) का सिद्धांत कहता है कि यह प्रभाव इसलिए होता है क्योंकि वयस्क अवस्था का शुरुआती समय परिवर्तन का होता है जिस दौरान हम नयी घटनाओं का अनुभव करते हैं, नये लोगों से मिलते हैं और नयी जगहों पर जाते हैं। इन अनुभवों का नयापन उन्हें यादों में टिकाये रहता है।

इसके विपरीत, जब हम लंबे समय तक किसी चीज से जुड़े रहते हैं, मसलन कई साल तक एक ही नौकरी में होना। ऐसे में हमारी गतिविधियां कम विविधता वाली होती हैं। परिणाम स्वरूप, विशेष घटनाओं के लिए व्यक्तिगत स्मृतियों की तुलना में दैनिक घटनाक्रम की सामान्य यादों के अधिक प्रभावी होने की संभावना है। उक्त सिद्धांत की पुष्टि इस निष्कर्ष से भी होती है कि आव्रजन या कॅरियर में बड़े बदलाव जैसे जीवन के बड़े परिवर्तन हमारी उन स्मृतियों की संख्या पर वैसा ही प्रभाव डालते हैं जो हमें आजीवन मिलती रहती हैं। अत्यंत स्थिरता: कोविड-19 लॉकडाउन ने एक संक्रमणकालीन अवधि के अनुरूप हमारे व्यवहार के तौर-तरीकों में बदलाव के लिए मजबूर किया। हमने अचानक अपने कई परिचितों के साथ बातचीत करना, काम पर या स्कूल जाना और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना बंद कर दिया।

लॉकडाउन के पहले महीने की घटनाओं को अधिक याद किया
संक्रमण सिद्धांत इस बात का पूर्वानुमान व्यक्त करता है कि हमारे पास उस समय की अधिक विशिष्ट घटनाओं की यादें होनी चाहिए जब सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों को पहली बार लागू किया गया था। हालांकि, सामान्य जीवन संक्रमण के विपरीत, लॉकडाउन के दौरान, नियमित गतिविधियों के एक सेट को दूसरे द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया गया था। इसके बजाय, हमारी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियाँ काफी कम विविधता वाली हो गईं, और हमने बहुत कम नई गतिविधियों में भाग लिया। हममें से कई लोग सापेक्ष स्थिरता की अवधि से अत्यधिक स्थिरता की अवधि में संक्रमण कर चुके हैं। नतीजतन, संक्रमण सिद्धांत का आकलन है कि हमारे पास लॉकडाउन की अवधि से कम विशिष्ट घटनाएं और यादें होनी चाहिए।

इन पूर्वानुमानों का परीक्षण करने के लिए, अल्बर्टा विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिकों नॉर्मन ब्राउन और ईमिन हेनॉय ने एक शोध अध्ययन किया, जहां उन्होंने प्रतिभागियों से सितंबर 2020 और अगस्त 2021 के बीच की ‘यादगार, दिलचस्प या महत्वपूर्ण घटनाओं’ को याद करने के लिए कहा। उनके परिणामों से पता चला कि प्रतिभागियों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिबंध लगाए जाने से पहले और बाद के महीनों की तुलना में कोविड-19 लॉकडाउन के पहले महीने (मार्च 2020) की घटनाओं को अधिक याद किया।

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