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शिमला, मनाली छोड़िए जनाब…मंगल ग्रह पर भी गिरती है बर्फ, सुबह होते ही हो जाती है छू मंतर

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वॉशिंगटन

मंगल ग्रह हमारी नजर में एक वीरान और सूखा ग्रह है। लेकिन सर्दियों में लाल ग्रह अचानक से बदल गया है। मंगल ग्रह के उत्तरी गोलार्थ में ठंड है। यहीं पर नासा का पर्सीवरेंस रोवर और इनजेनिटी हेलीकॉप्टर एक प्राचीन नदी डेल्टा में खोज कर रहा है। आम तौर पर एकदम खाली लगने वाला यह ग्रह बर्फ और ठंड से अनजान नहीं है। मंगल ग्रह के ध्रुवों पर तापमान माइनस 123 डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाता है। मंगल पर कार्बन डाइऑक्साइड आधारित बर्फ मिलती है। जिसे सूखी बर्फ या ड्राई आइस कहते हैं। इसके अलावा जमा हुआ पानी भी दिखता है।

यह बर्फ मंगल की सतह पर गिरती है। लेकिन पूरे मंगल पर नहीं बल्कि यह सिर्फ ध्रुवों के पास पाई जाती है। कैलिफोर्निया के पासाडेना में नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के मार्स वैज्ञानिक सिल्वेन पिकक्स ने कहा कि यहां इतनी बर्फ होती है कि आप स्कींग कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको किसी गड्ढे में जाना होगा, जहां एक ढलान वाली सतह पर बर्फ पड़ी हो।

बर्फ को गिरते नहीं देख सके वैज्ञानिक
अभी तक कोई भी रोवर या ऑर्बिटर मंगल पर बर्फ के गिरने को नहीं देख सका है, क्योंकि यह घटना ध्रुवों पर सिर्फ रात में होती है। इनमें लगे कैमरे बादलों के आरपार नहीं देख सकते। अभी तक ऐसा कोई रोबोट भी नहीं बनाया गया है जो मंगल ग्रह के ध्रुवों के खतरनाक तापमान से बच सके। ऐसे में आपका सवाल हो सकता है कि फिर हमें मंगल ग्रह पर बर्फ का पता कैसे लगा। मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटन पर एक इन्फ्रारेड कैमरा लगा है, जो इंसानों को न दिखने वाली रोशनी देख सकता है। इसने मंगल ग्रह पर गिरने वाली कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ का पता लगाया था।

सूरज निकलते ही गैस बन जाती है बर्फ
2008 में मंगल ग्रह पर पहुंचे फीनिक्स लैंडर ने भी उत्तरी ध्रुव से लगभग 1600 किमी दूर से अपने लेजर उपकरण के जरिए पानी वाली बर्फ का पता लगाया था। पानी वाली बर्फ गर्मी आने पर सूखी बर्फ के पिघलने पर दिखती है। यह बर्फ मिट्टी के साथ चिपक जाती है और बहुत हल्की होती है। लेकिन आपका सवाल होगा कि यह बर्फ कहां जाती है? दरअसल सूखी बर्फ गर्मी के मौसमे में सूरज की रोशनी के निकलते ही बादल में बदल जाती है। 2001 में मंगल की कक्षा में प्रवेश कने वाला ओडिसी ऑर्बिटर ने बर्फ को गैस में बदलते देखा था। मंगल ग्रह पर ठंड का मौसम लंबे समय तक चलता है। क्योंकि मंगल ग्रह को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में 687 दिन लगते हैं। यह पृथ्वी के लगभग दो साल के समय के बराबर है। वैज्ञानिक साल 1955 से मंगल ग्रह के वर्षों की गणना कर रहे हैं।

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