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लोकसभा चुनाव से पहले चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने सुना दिया फैसला, अब आगे क्या?

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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार एक ऐतिहासिक फैसले में चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया और कहा कि यह सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है। लोकसभा चुनाव से पहले आए इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को छह साल पुरानी योजना में दान देने वालों के नामों की जानकारी चुनाव आयोग को देने के निर्देश दिए। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि एसबीआई को राजनीतिक दलों द्वारा भुगतान कराए गए सभी चुनावी बॉन्ड का ब्योरा देना होगा। इस ब्योरे में यह भी शामिल होना चाहिए कि किस तारीख को यह बॉन्ड भुनाया गया और इसकी राशि कितनी थी। सभी डिटेल 6 मार्च तक चुनाव आयोग के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। और चुनाव आयोग को एसबीआई से मिली जानकारी को 13 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर देना होगा। चुनाव से ठीक पहले आए इस ऐतिहासिक फैसले को राजनीतिक दल चुनाव में अपने-अपने तरीके से पेश करेंगे।

बीजेपी को मिला सबसे अधिक पैसा, ये क्षेत्रीय दल भी नहीं पीछे
चुनावी बॉन्ड वो तरीका है जिसके जरिए राजनीतिक दलों को चंदा दिया जाता है। पहली बार वित्तमंत्री ने 2017-2018 के केंद्रीय बजट में इसकी व्यवस्था की थी। चुनावी बॉन्ड योजना- 2018 के अनुसार एक वचन पत्र जारी किया जाता है जिसमें धारक को राशि देने का वादा होता है। योजना भारतीय नागरिकों और घरेलू कंपनियों को इन बॉन्ड के जरिये दान करने की अनुमति देती है जो एक हजार, 10 हजार, एक लाख, 10 लाख और एक करोड़ रुपये के गुणांक में अपनी पसंद की पार्टी को दे सकते हैं। इन बॉन्ड को राजनीतिक पार्टियों द्वारा 15 दिनों के भीतर भुनाया जा सकता है। बीजेपी चुनावी बॉन्डों से सबसे ज्यादा पैसा लेने वाली पार्टी है।

पिछले 5 सालों में बीजेपी को इन चुनावी बॉन्ड से करीब 6565 करोड़ रुपये मिले। पिछले साल (2022-23) में उसकी कुल आय का 54% यानी 1294 करोड़ रुपये सिर्फ चुनावी बॉन्ड से आया। यह रकम पिछले साल के मुकाबले 25% ज्यादा है। बीजेपी के बाद चुनावी बॉन्ड से सबसे ज्यादा पैसा लेने वाली पार्टी कांग्रेस है। उसे पिछले 5 साल में इन बॉन्ड से 1122 करोड़ रुपये मिले। क्षेत्रीय दलों ने भी चुनावी बॉन्ड से अच्छी रकम हासिल की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि इलेक्टोरल बॉन्ड से संबंधित जो ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया गया है उसे देखने से साफ है कि केंद्र और राज्यों की रूलिंग पार्टी को चंदे का ज्यादा पार्ट मिला है।

क्षेत्रीय दलों ने भी चुनावी बॉन्ड से अच्छी रकम हासिल की
➤ पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 2017-18 से 2022-23 तक चुनावी बॉन्ड से 1093 करोड़ रुपये प्राप्त किए
➤ ओडिशा में लंबे समय से सत्ताधारी नवीन पटनायक की बीजू जनता दल ने इसी अवधि में 773 करोड़ रुपये प्राप्त किए
➤ तमिलनाडु में सत्ताधारी एमके स्टालिन की द्रमुक ने 2017-18 और 2022-23 के बीच 617 करोड़ रुपये प्राप्त किए
➤ दिल्ली और पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी इसी अवधि में इस माध्यम से 95 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त किए
कुछ राजनीतिक दल चुनावी बॉन्ड से अप्रभावित रहे
➤ वामपंथी दल सीपीआई और सीपीआई (एम) ने कभी इनसे पैसा नहीं लिया और इस योजना का विरोध भी किया
➤ मायावती की बसपा और मेघालय की सत्ताधारी नेशनल पीपुल्स पार्टी ने भी इनका इस्तेमाल नहीं किया

अब सवाल उठता है कि आगे क्या?
सरकार ने इन चुनावी बॉन्ड को नकद दान का विकल्प और पारदर्शिता बढ़ाने का उपाय बताया था। पहले राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से अधिक दान देने वाले सभी लोगों का विवरण बताना होता था। सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को 6 मार्च तक चुनावी बॉन्ड की बिक्री का विवरण देने और चुनाव आयोग को इसे 13 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करने का आदेश दिया है। इससे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पैसा देने वालों का नाम सार्वजनिक हो सकता है और यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। चुनाव के बीच राजनीतिक दल इनके सहारे एक दूसरे पर आरोप लगा सकती है कि किसने किस पार्टी को सबसे ज्यादा चंदा दिया।

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