नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास भेजे गए विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल यदि किसी बिल पर निर्णय लेना चाहते हैं, तो या तो उसे मंज़ूर करें, असहमति हो तो लौटाएं या राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजें—लेकिन उन्हें निर्णय टालने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान की व्यवस्था के अनुसार बिलों पर “तत्परता” से निर्णय आवश्यक है। अदालत ने कहा कि बिलों पर विचार के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की जा सकती, लेकिन यह भी नहीं कि उन्हें अनिश्चितकाल तक बिना निर्णय के लंबित रखा जाए। यदि राज्यपाल समय पर जवाब नहीं देते, तो यह संविधान की आत्मा के विरुद्ध माना जाएगा।
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संविधान पीठ ने कहा कि राज्य विधानमंडल से पारित विधेयक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, इसलिए उन पर समय रहते निर्णय आवश्यक है। कोर्ट ने संकेत दिया कि राज्यपाल का पद संविधान के तहत एक जिम्मेदारी है—यदि बिलों पर कार्रवाई में देरी होती है, तो शासन व्यवस्था प्रभावित होती है।
