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दिल्ली मेट्रो के लिए हो रही थी खुदाई और मिल गई मस्जिद…DMRC के सबसे मुश्किल सफर का किस्सा

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नई दिल्ली

दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने 10 साल बाद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता है। शुक्रवार को 68वें ‘नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स 2022’ की घोषणा हुई। डीएमआरसी की फिल्म ‘सरमाउंटिंग चैलेंजेज’ को बेस्ट प्रमोशनल फिल्म (नॉन फीचर) का अवॉर्ड मिला है। इससे पहले 2012 में भी डीएमआरसी की एक फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। 28 मिनट लंबी ‘सरमाउंटिंग चैलेंजेज’ दिल्ली मेट्रो के फेज-3 प्रोजेक्ट की चुनौतियों का बयां करती है। आइए जानते हैं दिल्ली मेट्रो के फेज-3 की खास बातें। साथ में डीएमआरसी के सबसे मुश्किल सफर का किस्सा। कैसे सुरंग बनाते वक्त जमीन में दफन एक ऐतिहासिक मस्जिद के मिलने से डीएमआरसी को टनल का अलाइनमेंट चेंज करना पड़ा और क्यों एक विशाल टनल बोरिंग मशीन जमीन के नीचे करीब 2 साल तक फंसी रही।

दिल्ली मेट्रो आज भारत का सबसे बड़ा मेट्रो रेल नेटवर्क
दिल्ली मेट्रो की पहली सर्विस 2002 में शुरू हुई। आज यह दुनिया के कुछ सबसे सफल अर्बन ट्रांसपोर्ट सिस्टम में से एक है जो दिल्ली के सभी चारों कोनो को जोड़ता है। एनसीआर के एक बड़े हिस्सा को कवर करता है। दिल्ली मेट्रो के लिए 1998 में निर्माण कार्य शुरू हुआ। शुरुआत रेड लाइन से हुई। शाहदरा और तीसहजारी के बीच पहले एलिवेटेड सेक्शन को 2002 में खोला गया। 12 लाइनें, 389 किलोमीटर लंबा नेटवर्क, 285 मेट्रो स्टेशनों के साथ आज दिल्ली मेट्रो भारत का सबसे बड़ा मेट्रो रेल नेटवर्क है।

खुदाई के दौरान मिले जमीन के भीतर दफन ऐतिहासिक मस्जिद के अवशेष
‘सरमाउंटिंग चैलेंजेज’ में दिल्ली मेट्रो के फेज-3 प्रोजेक्ट के बारे में बताया गया है। घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों के अलावा ऐतिहासिक स्थलों के नीचे अंडरग्राउंड सेक्शन इस प्रोजेक्ट को भारत ही नहीं दुनिया के कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाता है। दिल्ली गेट से जामा मस्जिद सेक्शन सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण था। 6 जुलाई 2012 को नेताजी सुभाष पार्क एरिया में मेट्रो स्टेशन बनाने के लिए खुदाई हो रही थी तभी डीएमआरसी को जमीन के भीतर एक मध्यकालीन इमारत के अवशेष मिले। यह जमीन से करीब 10-12 फीट नीचे दफन था। ये बात जंगल की आग की तरह आस-पास के इलाकों में फैल गई। स्थानीय लोगों का कहना था कि अवशेष 17वीं सदी के अकबराबादी मस्जिद से जुड़ा है। अकबराबादी मस्जिद को मुगल बादशाह शाहजहां ने 1650 में अपनी पत्नी अकबराबादी बेगम के नाम पर बनवाया था। कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के बाद ये मस्जिद इंकलाबी गतिविधियों का केंद्र बन गई जिसकी वजह से अंग्रेजों ने उसे नष्ट कर दिया।

मस्जिद को नुकसान न पहुंचे, इसलिए बदलनी पड़ी सुरंग की दिशा
सुरंग की खुदाई के दौरान पुरातात्विक महत्व के अवशेष मिलने से डीएमआरसी की चुनौतियां बढ़ गईं। अवशेष को कोई नुकसान न पहुंचे, इसलिए टनल के अलाइनमेंट को बदलने का फैसला किया गया। उसे अति व्यस्त नेताजी सुभाष मार्ग पर शिफ्ट किया गया जिसका ज्यादातर हिस्सा बेहद घने बसावट वाले रिहायशी इलाके दरियागंज के नीचे था। अलाइनमेंट शिफ्ट करना इसलिए चुनौतीपूर्ण था कि पहले यह गैर-रिहायशी खुली जगहों के नीचे से गुजर रहा था। अब उसे घनी आबादी वाले रिहायशी इलाके के नीचे शिफ्ट करना पड़ा।

96 मीटर लंबी, 500 टन वजनी विशालकाय टनल बोरिंग मशीन का भी हुआ इस्तेमाल
फेज-3 के दौरान सुरंग की खुदाई के लिए जिन टनल बोरिंग मशीनों (TBM) का इस्तेमाल किया गया उसमें तो एक 96 मीटर लंबी और करीब 500 टन वजनी थी। यह टीबीएम पूरी तरह असेंबल्ड थी। यह दिल्ली मेट्रो के किसी भी प्रोजेक्ट में इस्तेमाल की जाने वाले सबसे विशालकाय टीबीएम थी। प्रोजेक्ट पर काम कर रही हर टीबीएम को उसके नंबर के नाम से जाना जाता था। विशालकाय टीबीएम को टीबीएम-3 नाम से जाना जाता था। फेज-3 में सुरंग बनाने के दौरान अगर किसी टीबीएम को सबसे पहले किसी दिक्कत का सामना करना पड़ा तो यही टीबीएम थी।

जब बेयरिंग फेल होने से 2 साल तक एक ही जगह पर फंसी रही TBM
नेताजी सुभाष पार्क के पास जब टीबीएम-3 ने सुरंग बनाना शुरू किया तब हार्ड रॉक मिले। 35 रिंग पूरा होने के बाद टीबीएम के सामने अचानक एक बहुत पुराना कुआं आया। बात अक्टूबर 2013 की है। ये कुआं कस्तूरबा गांधी अस्पताल के नजदीक था। इस चुनौती को तो 24 घंटे के भीतर ही निपटा लिया गया। लेकिन जैसे ही कस्तूरबा गांधी अस्पताल के आगे सुरंग का काम शुरू हुआ, टीबीएम का बेयरिंग फेल हो गया। यह करीब 2 सालों तक फंसी रही। टीबीएम-3 से ही दिल्ली गेट और जामा मस्जिद सेक्शन के बीच सुरंग की खुदाई करनी थी लेकिन इसके फंस जाने की वजह से 2 और टीबीएम को काम पर लगाना पड़ा था। दरियागंज के नीचे सुरंग की खुदाई अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती थी। ऊपर न सिर्फ घनी आबादी थी बल्कि इमारतें भी काफी पुरानी थी जिनमें से ज्यादातर जर्जर हालत में थी। नीचे सुरंग की खुदाई हो रही थी। एहतियात के तौर पर दरियागंज के 2000 लोगों को उनके रिहायश से दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा। उन्हें आस-पास के गेस्ट हाउसों में शिफ्ट किया गया।

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