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नेहरू ने किसकी खुशी के लिए ‘इंदिरा’ को तोहफे में दिया था? दिल जीत लेने वाली वो कहानी

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नई दिल्‍ली

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को खत लिखना-पढ़ना काफी पसंद था। वह दोस्‍तों और परिवार के लोगों के साथ बच्‍चों को भी चिट्ठ‍ियां लिखते रहते थे। इतना ही नहीं उनके जवाब भी देते थे। चिट्ठियां लिखने में रोजाना वह कुछ घंटे जरूर निकालते थे। बात जब बच्‍चों की हो तो नेहरू जवाब देने की पूरी कोशिश करते थे। दिन था 2 अक्‍टूबर और साल था 1949। रोज की तरह नेहरू चिट्ठियां पढ़ रहे थे। अचानक वह चौंक जाते हैं। जापान से उनके पास कई चिट्ठ‍ियां आई थीं। इन्‍हें स्‍कूल के बच्‍चों ने लिखा था। नेहरू की दिलचस्‍पी अब इन्‍हें पढ़ने में और बढ़ जाती है। इन्‍हें पढ़ते-पढ़ते नेहरू के चेहरे पर मुस्‍कान बिखर जाती है। इन चिट्ठियों में बच्‍चों ने एक अजीब सी मांग की थी। वे सभी अपने देश में हाथी चाहते थे। उनके चिड़‍ियाघर में कोई हाथी नहीं था। इस बात से जापान के बच्‍चे दुखी थे। देश-दुनिया में नेहरू का बच्‍चों के लिए प्‍यार चर्चित था। अपने ‘चाचा’ से बच्‍चे गिफ्ट चाहते थे। नेहरू ने इन बच्‍चों को उदास नहीं होने दिया। उन्‍होंने इन जापानी बच्‍चों को तोहफे में एक हथिनी भेजी थी। इसका नाम था इंदिरा (Indira)। यह उनकी बेटी इंदिरा के नाम पर था।

च‍िड़‍ियाघर में हाथी चाहते थे जापानी बच्‍चे
नेहरू का बच्‍चों के लिए प्‍यार कुछ अलग ही था। वह कभी उनकी बात टालते नहीं थे। चिट्ठ‍ियों के जरिये उनके साथ बातें भी करते थे। बेटी इंदिरा को जेल से चिट्ठ‍ियां लिखने की बात तो जगजाहिर है। बात दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान की है। जापान में पॉलिसी के तहत चिड़ियाघर के ‘सबसे खतरनाक’ जानवरों को मारने का फैसला लिया गया था। 1943 में तीन हाथी भूख से मर गए थे। टोक्‍यो के यूनो चिड़‍ियाघर में इसके बाद कोई हाथी नहीं बचा था। कुछ अरसा बीत जाने के बाद जापान के बच्‍चे हाथी देखने के लिए तरस रहे थे। अपने चिड़‍ियाघर में एक भी हाथी न होने से वे बहुत दुखी थे। उन्‍हें लगा कि अब दूर देश में बैठे चाचा नेहरू ही उनके लिए कुछ कर सकते हैं। तड़ातड़ स्कूल के कई बच्‍चों ने जुटकर नेहरू को चिट्ठियां भेजीं। इन सभी में सिर्फ एक मासूम मांग थी। चाचा भारत से एक हाथी भेज दो।

तुरंत ऐक्‍शन में आ गए थे नेहरू
बच्‍चों की इस ख्‍वाहिश को पूरा करने के लिए नेहरू ने थोड़ा भी समय नहीं लगाया। वह तत्‍काल ऐक्‍शन में आ गए। उन्‍हें 15 साल की एक हथिनी मिल गई। इसका नाम उनकी बेटी के नाम पर रखा गया। जब इंदिरा को उन्‍होंने जापान भेजा तो एक खत भी लिखा था। इसमें नेहरू ने कहा था कि इसे मेरे तोहफे के तौर पर नहीं भारतीय बच्‍चों को जापान के बच्‍चों को गिफ्ट के तौर पर लेना चाहिए। इंदिरा बहुत होशियार, मजबूत और धैर्यवान है। उन्‍होंने उम्‍मीद जताई थी कि सभी इन गुणों को विकसित कर पाएंगे। नेहरू ने ल‍िखा था- इंदिरा भारत के बच्‍चों की ओर से जापान के बच्‍चों को शांति और सहयोग का गिफ्ट है।

इस द‍िन इंदिरा का हुआ था जोरदार स्‍वागत
25 सितंबर 1949 को इंदिरा यूनो के चिड़‍ियाघर में पहुंची थी। जापान में पूरे गाजे-बाजे के साथ इंदिरा का स्‍वागत हुआ था। इंदिरा की एक झलक पाने को हजारों लोग चिड़‍ियाघर में जमा हुए थे। जापान के पूर्व प्रधानमंत्री एस योशिदा भी स्‍वागत समारोह में पहुंचे थे। तब तदामिची कोगा चिड़‍ियाघर के हेड थे। उन्‍होंने बाद में बताया था कि इंदिरा का स्‍वागत करना उनकी जिंदगी का सबसे खुशनुमा पल था। तब दो महावत भी इंदिरा के साथ गए थे। कारण था कि इंदिरा नाम की यह हथिनी मैसूर की थी। यह कन्‍नड़ में ही निर्देशों को समझती थी। इंदिरा को सुगाया और शिबुया के हाथों सुपुर्द किया गया था। इंदिरा से बात करने के लिए उन्‍हें तब भारतीय महावतों से क्‍लास लेनी पड़ी थी। इसमें दो महीने का वक्‍त लगा था।

इंद‍िरा को भूल नहीं पाया जापान
1957 में नेहरू बेटी इंदिरा गांधी के साथ जापान के दौरे पर गए थे। तब दोनों की जापान में इंदिरा से आमने-सामने मुलाकात हुई थी। मीडिया में यह इवेंट जमकर कवर हुआ था। 1983 में अपनी मौत तक यह हथिनी भारत की एंबेसडर बनी रही। इसे जापानियों का बहुत ज्‍यादा प्‍यार मिला। इसकी मौत पर टोक्‍यो के गवर्नर शुनिची सुजुकी ने श्रद्धांजलि दी थी। त‍ब उन्‍होंने कहा था कि इंदिरा ने जापानी बच्‍चों को बड़ा सपना दिया। इसने भारत-जापान की दोस्‍ती में 30 साल से ज्‍यादा समय तक एक बड़ी भूमिका निभाई।पहले प्रधानमंत्री का जापान के बच्‍चों को यह तोहफा वाकई अनमोल था!

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