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चीन के दुश्मनों में दोस्त खोजे भारत, जिनपिंग की तीसरी पारी पर ऐसा क्यों कह रहे एक्सपर्ट

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नई दिल्ली

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं यह बात लगभग तय हो गई है। पिछले एक दशक में शी के आदेश पर किसी ने सवाल नहीं खड़े किए हैं और न ही उनकी ताकत को किसी ने चुनौती दी है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं नेशनल कांग्रेस जारी है और इसका समापन 22 अक्टूबर को होगा। इसी दिन शी जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल की बात क्लियर हो जाएगी। इस फैसले के साथ ही शी जिनपिंग की ताकत और बढ़ जाएगी। कांग्रेस में अपनी वर्क रिपोर्ट पेश करते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहले दिन कहा कि उनकी अगुवाई में चीन की सेना लड़ने और जीतने के लिए सैन्य लड़ाकू तैयारियों को तेज करेगी। शी जिनपिंग के शासन का चीन और दुनिया के देशों पर क्या असर पड़ेगा। शी के शासन के भारत के लिए क्या मायने हैं। इन तमाम मुद्दों पर JNU में चाइनीज एंड सिनोलॉजिकल स्टडीज के प्रोफेसर प्रियदर्शी मुखर्जी ने कहा कि भारत अब चीन पर भरोसा रखने की उम्मीद छोड़ दे।

शी जिनपिंग का एक और कार्यकाल, भारत को है अलर्ट रहने की जरूरत
गलवान में खूनी संघर्ष के बाद से पिछले ढाई साल से जो हालात हैं और उससे पूर्व के अनुभव को देखते हुए भारत को शांति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। प्रियदर्शी मुखर्जी का कहना है कि चीन वास्तव में इतिहास के किसी भी समय भारत का दोस्त नहीं रहा है। कांग्रेस उद्घाटन के दिन गलवान हिंसक झड़प की क्लिप दिखाना चीन के इस खेल की पुष्टि करता है। इस बात से साफ पता चलता है कि वह भारत के साथ संबंध नहीं सुधारना चाहता है। चीन निश्चित रूप से भारत की सीमाओं का अतिक्रमण करना जारी रखेगा। चीन कोविड जैसी भयंकर महामारी के दौरान भी बाज नहीं आया। वह अपनी इस रणनीति पर आगे बढ़ता रहा। यदि अब भी हम उम्मीद करते हैं कि चीन हमारे साथ शांति बनाए रखने की कोशिश करेगा, तो यह पूरी तरह से मूर्खता होगी। हमें अपने सैनिकों की ताकत और अधिक बढ़ानी होगी। अब चीन पर भरोसा नहीं कर सकते।

चीन को लेकर कैसे आगे बढ़े भारत
हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि दोनों पक्षों के बीच कितनी भागीदारी होगी। चीनी विदेश मंत्री वांग यी यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद बिन बुलाए भारत के लिए उड़ान भरते हैं और सोचते हैं कि भारत ने युद्ध पर तटस्थ रुख अपनाया है तो चीन के पक्ष में होगा। हालांकि यह चीन की अलग नीति है। ताइवान में चीनी सैन्य अभ्यासों को सबने देखा। बाहुबल और धन शक्ति के आधार पर चीन दुनिया के साथ अपने संबंधों को देखता है। उसका यह दृष्टिकोण जगजाहिर हो चुका है। शी के शासन में चीन को दुनिया ने देखा है। प्रोफेसर प्रियदर्शी का कहना है कि शी के शासन में चीन अपने हितों के लिए दुनिया के किसी भी देश से सीधे-सीधे टकराव के मूड में है। अमेरिका और चीन के तल्ख रिश्ते भी इस बात की गवाही देते हैं। शी का एक और कार्यकाल चीन को इस दिशा में और आगे बढ़ाएगा।

चीन खुलेआम कर रहा है दुश्मनी का इजहार
क्वाड के साथ मिलकर काम करने से क्या भारत को चीन का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। यह सवाल भी बड़ा मुश्किल है। प्रोफेसर प्रियदर्शी का मानना है कि दरअसल क्वाड में शामिल हर कोई अपने हित के बारे में सोच रहा है। वहीं इसमें शामिल देशों को देखा जाए तो केवल भारत की ही चीन के साथ भूमि सीमा है। ऐसे में यदि हम कहते हैं कि क्वाड समस्या का समाधान करेगा, तो नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। भारत को चीन के शत्रुओं जैसे वियतनाम या चीन के कर्ज के जाल में फंसे देशों के साथ और अधिक संबंधों का पता लगाना चाहिए। चीन ने खुले तौर पर भारत को अपना दुश्मन घोषित कर दिया है। यदि आप उनके ब्लॉग और समाचारों को पढ़ते हैं, तो आप देखेंगे कि वे खुले तौर पर भारत के प्रति दुश्मनी का इजहार कर रहे हैं।

शी जिनपिंग के शासन में चीन के अगले 5 साल
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं नेशनल कांग्रेस को चीनी राजनीति, नीति और विदेशी मामलों के लिए एक निर्णायक क्षण है। चीन की घरेलू और विदेश नीति का प्रभाव भी इसमें समाहित है। कुटिल चाल और छिपे हुए व्यक्तिगत समीकरणों के एक जटिल जाल के माध्यम से शी जिनपिंग अगले कुछ वर्षों या दशकों तक सर्वोच्च शासन करते रहेंगे। शी ने उन सभी को स्पष्ट कर दिया है कि वह आने वाले वर्षों तक चीनियों पर शासन करेंगे। अपनी नई सैन्य और आर्थिक ताकत के साथ चीन अपने टकराववादी रवैये को नहीं छोड़ेगा, खासकर अमेरिका के साथ। ऐसे में हम हम किसी बदलाव की उम्मीद करते हैं तो यह हमारी ओर से एक मूर्खता होगी।

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