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21 साल से हमारे निर्देश की अनदेखी कर रहे हैं… पंजाब सरकार पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, जानिए क्या है मामला

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के साथ सतलज और यमुना नदी के जल बंटवारे के मामले में पंजाब सरकार को फटकार लगाई। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार से इस बात पर नाराजगी जताई कि उसने 21 साल पुराने निर्देश का अब तक पालन नहीं किया है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2002 में पंजाब सरकार को सतलज और यमुना नदियों को जोड़ने वाली नहर का अपना हिस्सा बनाने का निर्देश दिया था जिसकी अनदेखी पर अदालत ने खरी-खोटी सुना दी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने पंजाब की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी सरकार को आदेशों का पालन करने के लिए चेतावनी दी। जस्टिस एसके कौल के नेतृत्व वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने पंजाब सरकार से कहा कि उसे ‘सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा को स्वीकार करना होगा’। कोर्ट ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार से कहा, ‘हमें कड़े आदेश जारी करने के लिए मजबूर न करें’। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस विषय पर पंजाब और हरियाणा सरकारों के बीच बातचीत की देखरेख करने का निर्देश दिया। ध्यान रहे कि हरियाणा ने नहर के अपने आधे हिस्से का निर्माण पूरा कर लिया है।

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी पर पंजाब सरकार का बचाव
जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने केंद्र से यह भी कहा कि वह निर्माण से पहले जमीन का सर्वे करने की जिम्मेदारी ले और उसे पूरा करे। मामले की अगली सुनवाई जनवरी में होगी। बुधवार की सुनवाई में पंजाब सरकार की ओर से पेश वकील ने विपक्षी दलों के दबाव और किसानों से जमीन अधिग्रहण में समस्याओं को देरी का हवाला दिया। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गुस्से में जवाब देते हुए कहा, ‘राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं (लेकिन) कुछ करना भी होगा। नहर का निर्माण पंजाब में करना होगा… हमें कड़े आदेश जारी करने के लिए मजबूर न करें।’

हरियाणा सरकार ने रखी यह दलील
इससे पहले, हरियाणा के वकील ने दलील दी, ‘अब केवल निर्माण बाकी है। पंजाब को निश्चित रूप से सहयोग करना होगा। यही संघवाद है… हमें आगे बढ़ना होगा।’ इस पर कोर्ट ने कहा, ‘आप (दोनों राज्य) मामले को एक साथ हल करें… हमें सख्त आदेश जारी करने के लिए मजबूर न करें।’ अदालत ने कहा, ‘हम इसमें नहीं जा सकते… आपको समाधान खोजना होगा।’ फिर कोर्ट ने केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे वकील से पूछा, ‘आप क्या कर रहे हैं?’ आज की सुनवाई से एक हफ्ते पहले ही भगवंत मान ने अमृतसर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी और अपनी ओर से नहर के निर्माण का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने नहर को पंजाब के लिए ‘बेहद भावनात्मक मुद्दा’ बताया और कहा कि इसके निर्माण से कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है।

सतलज-यमुना लिंक नहर विवाद को समझें
सतलज-यमुना को जोड़ने वाले नहर का विवाद 1981 के जल-बंटवारा समझौते से पैदा हुआ है। उस समौझते से हरियाणा को 1966 में पंजाब से अलग कर दिया गया था। पानी के बंटवारे के लिए नहर का निर्माण किया जाना था और दोनों राज्यों को अपने-अपने क्षेत्रों में संबंधित हिस्सों का निर्माण करने की जरूरत थी। वर्ष 2004 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने सतलज-यमुना लिंक डील और इसी तरह के समझौतों को रद्द करने वाला कानून पारित किया। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में कानून को रद्द कर दिया। हालांकि, पंजाब ने जमीनों को उनके मालिकों को वापस कर दिया जिनपर नहर का निर्माण किया जाना था।

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