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आंख मूंद कर भरोसा न करें… राज्यसभा में उठा गूगल मैप का मुद्दा, सांसद ने हादसों पर जताई चिंता

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नई दिल्ली

गूगल मैप पर आंख बंद कर भरोसा करना कई बार जान बन आता है और ऐसे कई मामलों में हुआ भी है। बिहार का एक परिवार गोवा जाते हुए कर्नाटक के जंगल में पहुंच गया, वहीं पूर्व में कई जानलेवा हादसे भी हो चुके हैं। राज्यसभा सदस्य डॉ. अजीत माधवराव गोपछड़े ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि गूगल मैप का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है और लोग अपनी यात्रा के लिए इस मैप का प्रयोग करते हैं। लेकिन पूर्व में देखने में आया था कि केरल के दो डॉक्टरों की जान तब गई जब उनका जीपीएस नेविगेशन सिस्टम उन्हें पेरियार नदी के पानी में ले गया।नदी में गिरने के कारण उन दोनों डॉक्टरों की जान चली गई। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों, स्टार्टअप्स को बढ़ावा देते हुए इसरो के सहयोग से एक ऐसी व्यापक और नई तकनीक विकसित की जानी चाहिए, जो ज्यादा सुरक्षित हो और भारतीय स्थितियों के हिसाब से उस तकनीक को तैयार किया जाए।

‘गूगल मैप कई बार बताता है गलत रास्ते’
राज्यसभा सदस्य ने हाल ही में बिहार के एक परिवार के साथ हुई घटना का हवाला देते हुए कहा कि बिहार का एक परिवार गोवा जाने के लिए निकला। गूगल मैप का प्रयोग किया और वह परिवार गोवा तो नहीं पहुंचा लेकिन कर्नाटक के घने जंगलों में फंस गया। गूगल मैप के चक्कर में बिहार का परिवार बेलागवी जिले के खानपुर तालुक के घने जंगल में फंस गया। बाद में पुलिस और ग्रामीणों ने उन्हें बचाया। कई घंटे तक परिवार अपनी कार में फंसा रहा। यह घटना काफी डरावनी थी। परिवार के साथ बच्चे भी थे। कई बार मौसम खराब होने के कारण गलत रास्ते पर चले जाते हैं।

सांसद ने कहा कि यूपी के बरेली में भी एक बड़ा हादसा हुआ था। बरेली में निर्माणाधीन पुल से रामगंगा नदी में अचानक कार जा गिरी, जिसमें सवार तीन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने कार को जेसीबी की मदद से नदी से बाहर निकाला था। इसी तरह के कई मामले आजकल सामने आ रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि इसरो की मदद से एक व्यापक डेटा बेस का प्रयोग कर कोई तकनीक विकसित की जाए।

धार्मिक स्थलों पर बुजुर्गों को आने वाली समस्या
बीजेपी के डॉ.सिकंदर कुमार ने कहा कि कई धार्मिक स्थलों पर बुजुर्गों को बहुत परेशानी होती है और उन्हें बहुत ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। ऐसे में जरूरी है कि धार्मिक स्थलों पर एक्सीलेटर मशीन और लिफ्ट का इंतजाम हो। ताकि बुजुर्गों के साथ- साथ उन लोगों को भी आसानी हो, जो सीढ़ियां नहीं चढ़ पाते हैं।

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