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Tuesday, June 2, 2026
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क्या है संविधान की धारा 192(2), जिसका हवाला दे चुनाव आयोग ने CM सोरेन को बैरंग लौटा दिया

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नई दिल्ली

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन को लेकर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला पिछले कुछ महीनों से गरमाया हुआ है। भाजपा ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग करते हुए मोर्चा खोल रखा है। गवर्नर तक शिकायत पहुंची तो राज्यपाल रमेश बैस ने मामले को दिल्ली भेज दिया। उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग से राय मांगी। चुनाव आयोग ने मई में सीएम से जवाब भी मांगा था। लेकिन अब चुनाव आयोग ने क्या फैसला किया है, इसको लेकर सस्पेंस बना हुआ है। इस बीच, सीएम हेमंत सोरेन ने कानूनी रास्ते से आयोग के मंतव्य की कॉपी मांगी थी लेकिन आयोग ने साफ मना कर दिया। आइए जानते हैं कि वह कौन सा कानून है जिसके तहत झारखंड सीएम को निराशा हाथ लगी।

कानूनी पहलू समझने से पहले राज्यपाल रमेश बैस का वो चुटीला बयान भी जान लीजिए जो उन्होंने एक दिन पहले दिया था। वह रांची में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे, मीडिया ने पूछ लिया कि चुनाव आयोग दिल्ली से जो लिफाफा आया है उसमें क्या है? इस पर राज्यपाल ने बड़े ही चुटीले अंदाज में कहा कि निर्वाचन आयोग से जो लिफाफा मिला है वह इतना चिपका हुआ है कि खुल ही नहीं रहा है।

अब बात कानून की
सीएम सोरेन ने अपने वकील के माध्यम से 1 सितंबर और 15 सितंबर को आयोग को पत्र लिखकर अपनी राय की एक प्रति उन्हें उपलब्ध कराने की मांग की थी। EC का जवाब आया कि संविधान की धारा 192 (2) के तहत इस मामले में राजभवन का आदेश आने से पहले आयोग अपने मंतव्य की कॉपी नहीं दे सकता। आयोग ने साफ कहा कि यह संविधान का उल्लंघन होगा। अगर भारत के संविधान के आर्टिकल 192 (2) को जाकर पलटें तो उसमें कहा गया है, ‘ऐसे किसी भी प्रश्न पर कोई फैसला लेने से पहले, राज्यपाल चुनाव आयोग की राय प्राप्त करेंगे और उस ओपिनियन के अनुसार कार्य करेंगे।’

दरअसल, सीएम सोरेन के लिए टेंशन तब तक बनी रहेगी जब तक कि यह पता नहीं चल जाता कि चुनाव आयोग ने क्या राय दी है क्योंकि उसी के आधार पर गवर्नर फैसला कर सकते हैं। आयोग की ओर से 25 अगस्त को ही पत्र राजभवन भेज दिया गया था। पहले भी Office Of Profit के चक्कर में कई सांसद और विधायकों की कुर्सी जा चुकी है। इसको लेकर संविधान के अनुच्छेद 102 (1) A में साफ कहा गया है कि कोई भी सांसद या विधायक किसी ऐसे पद पर नहीं रह सकते जहां वेतन, भत्ते या प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से या फिर किसी दूसरी तरह के फायदे मिलते हों। भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 9 (A) के तहत भी सांसदों और विधायकों को किसी दूसरे मद से लाभ या अन्य पद लेने पर रोक है।

पूरा मामला रांची में पत्थर खनन लीज के आवंटन से जुड़ा है, जिस पर भाजपा के नेताओं ने राज्यपाल से शिकायत की थी। आरोप लगाया गया है कि सीएम रहते रांची के अनगड़ा में उनके नाम से पत्थर खदान की लीज आवंटित की गई थी। इसे लाभ का पद और जन प्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन बताया गया है।

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