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बिहार में अंतिम चरण का चुनाव, छात्र नेता हर्षराज हत्याकांड से बदल सकती इन सीटों पर बाजी

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नई दिल्ली,

बिहार में 1 जून को अंतिम चरण के चुनाव में आठ संसदीय सीटों पर वोटिंग होनी है. एनडीए और इंडिया गठबंधन अपने प्रत्याशियों के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं. दोनों ओर से अपने कोर वोटर्स के अलावा अन्य जातियों को पटाने की हर संभव कोशिश की जा रही है. लेकिन इस बीच बिहार में हुई कुछ घटनाओं का प्रभाव आगामी वोटिंग में पड़ना तय माना जा रहा है. पटना के लॉ कॉलेज में सोमवार को सैकड़ों छात्रों के सामने हुई छात्र नेता हर्ष राज की हत्या पर राजनीति होनी तय है. इस हत्याकांड में आज यानी कि मंगलवार को एक गिरफ्तारी भी हुई है. मृत छात्र और हत्यारोपी छात्रों की जातियां राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक हैं. जाहिर है कि हत्याकांड कम से कम 3 सीटों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है. इसी तरह तेजस्वी का मुस्लिम आरक्षण पर किया गया एक ट्वीट भी मुद्दा बन सकता है.

हर्षराज हत्याकांड पर राजनीति होनी तय
छात्र नेता हर्षराज का सियासी कनेक्शन रहा है. मृतक छात्र हर्षराज बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी के परिवार के काफी करीबी थे. अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी हर्ष को अपना मुंहबोला भाई मानती थीं. भूमिहार जाति के हर्ष शाम्भवी चौधरी के लिए समस्तीपुर में चुनाव प्रचार के दौरान मौजूद थे. हर्षराज पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव की तैयारी भी कर रहे थे.पिछले साल पटना के मिलर हाई स्कूल में डांडिया नाइट का आयोजन हर्ष ने करवाया था. इस आयोजन में पटना विश्वविद्यालय के सैकड़ों छात्र शामिल हुए थे. इसी कार्यक्रम में पटेल और जैक्सन हॉस्टल के छात्रों की हर्षराज के बाउंसर के साथ मारपीट हो गई थी. जिसमें एक छात्र का सिर फट गया था.

हर्षराज हत्याकांड के मुख्य आरोपी चंदन यादव ने स्वीकार किया है कि मिलर हाई स्कूल में डांडिया नाइट में हुए झगड़े का बदला लेने के लिए हर्ष को मारा गया. गिरफ्तार चंदन यादव पटना कॉलेज में बीए फाइनल ईयर का छात्र है और जैक्सन हॉस्टल में रहता है. वारदात के दूसरे दिन से पटना में बवाल जारी है. पुलिस ने हालात को काबू में करने के लिए प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज भी किया था.

भूमिहार बनाम यादव होना तय
बिहार में हर घटना के पीछे जाति कनेक्शन ढूंढ लिया जाता रहा है. यहां जातियों के संघर्ष की कहानी बहुत लंबी है. विशेषकर अगड़ा बनाम पिछड़ा संघर्ष का दशकों तक गवाह रहा है यह राज्य. अगड़ी जाति की कमान भूमिहारों के हाथ में रहती थी तो पिछड़ों की कमान यादव संभालते रहे हैं. हालांकि अब यह सब बहुत पुरानी बात हो चुकी है. जातिगत संघर्ष में पिछड़ों का नेतृत्व करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के साथ अब तमाम सवर्ण विशेषकर भूमिहार भी हैं. और कई संसदीय सीटों पर भूमिहारों ने आरजेडी को भी वोट दिया है. हो सकता है कि हर्षराज हत्याकांड के बाद भूमिहार एक बार फिर आरजेडी से अपना नाता तोड़ लें. अंतिम चरण का मतदान एक जून को होने वाला है. चूंकि आरजेडी को यादवों की पार्टी माना जाता है इसलिए हो सकता है कि आरजेडी को भूमिहारों के वोट न मिलें. इसी तरह बीजेपी को एक दो सीटों पर कुछ यादव वोट मिलने की उम्मीद थी वो भी अब संकट में पड़ सकता है.

इन सीटों पर पड़ सकता है असर
वैसे तो सातवें चरण में आठों सीटों पर भूमिहार और यादव वोटर्स का वोट है. जहानाबाद, बक्सर और आरा में भी भूमिहार वोटरों की संख्या अच्छी खासी है पर मुख्य रूप से इन तीन सीटों पर हर्षराज हत्याकांड का असर पड़ सकता है.

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