हैदराबाद
तेलंगाना में हैदराबाद विश्वविद्यालय के बगल के भूखंड पर स्थित पेड़ों की कटाई पर जहां सुप्रीम कोर्ट ने राेक लगा दी है तो वहीं तेलंगाना सरकार ने कांचा गाचीबोवली भूमि विवाद को लेकर प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज किए मामलों को वापस लेने का आदेश दिया है। तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री भट्टी विक्रमार्क मंगलवार को इस फैसले की जानकारी मीडिया को दी। विक्रमार्क ने कुलपति को लिखे पत्र में कहा कि कांचा गाचीबोवली की 400 एकड़ भूमि को छोड़कर विश्वविद्यालय परिसर में पुलिस की मौजूदगी भी हटा ली जाएगी। पत्र में कहा गया है कि आगे चलकर परिसर में शांति और सुरक्षा बनाए रखना विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी होगी।
बीआरएस सरकार में हुई तबाही
भूखंड पर पेड़ों की कटाई को लेकर मचे घमासान के बीच राज्य के उद्योग एवं आईटी मंत्री डी श्रीधर बाबू ने विरोध को छलावा करार दिया है। डी श्रीधर बाबू ने कहा है कि असली पर्यावरणीय विनाश बीआरएस शासन में हुआ था। तेलंगाना की रेवंत सरकार में कद्दावर मंत्री डी श्रीधर बाबू के अनुसार हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (एचसीयू) का विरोध चुनिंदा आक्रोश और बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है। डी श्रीधर बाबू ने दावा किया है कि अकेले 2016 और 2019 के बीच तेलंगाना भर में 12.12 लाख से अधिक पेड़ काटे गए। राज्य ने 11,422 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए बदल दिया। तब विरोध नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय तबाही के सबसे ज्वलंत उदाहरणों में से एक कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना थी एक दिखावटी मेगा-प्रोजेक्ट जिसने 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक सार्वजनिक धन निगल लिया। इसमें 8,000 एकड़ से अधिक जंगल को तहस-नहस कर दिया। बीआरएस नेता केटीआर ने आरोप लगाया था कि तेलंगाना सरकार एचसीयू की जमीन लेना चाहती है।
16 अप्रैल को अगली सुनवाई होगी
मीडिया और सोशल मीडिया में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों के विरोध के तूल पकड़ने पर तीन अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने पेड़ों को काटे जाने पर रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ अगली सुनवाई के लिए 16 अप्रैल की तिथि निर्धारित की है। इस मुद्दे पर रेवंत रेड्डी सरकार को बीआरएस और बीजेपी ने घेरा था। यह पूरा विवाद हैदराबाद विश्वविद्यालय से सटी 400 एकड़ जमीन पर पेड़ों की कटाई को लेकर है। छात्रों का कहना है कि यह जंगल विश्वविद्यालय से लगा हुआ है और इसके कटने से न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि इलाके की जैव विविधता भी प्रभावित होगी। कई रिपोर्ट्स में इस इलाके में झीलों और खास तरह की चट्टानों के नुकसान की बात भी कही गई है।
