नई दिल्ली
साइप्रस ने 2007 में एक योजना शुरू की, नाम था- साइप्रस इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम। इसका एक और नाम था, ‘गोल्डन पासपोर्ट’ स्कीम। मकसद था रईस लोगों को साइप्रस की नागरिकता देना, जिससे वहां सीधे तौर पर विदेशी निवेश बढ़ सके। अब तक कुल 66 भारतीयों ने साइप्रस का गोल्डन पासपोर्ट लिया है। द इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, इनमें भारत के सबसे अमीर व्यक्ति गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद का नाम भी शामिल है। मशहूर कारोबारी पंकज ओसवाल और रियल एस्टेट बैरन सुरेंद्र हीरानंदानी का नाम भी है। साइप्रस तमाम ऑफशोर कंपनियों का ठिकाना है। रईस भारतीयों और NRIs की पसंद भी है। देश में मनी लॉन्ड्रिंग व अन्य आपराधिक मामले झेल रहे लोग यहां सुरक्षित रह सकते हैं। साइप्रस का सरकारी ऑडिट दिखाता है कि कुल 7,327 लोगों को पासपोर्ट दिया गया। इनमें से 3,517 ‘इनवेस्टर्स’ थे और बाकी उनके परिवार के लोग।
साइप्रस की ‘गोल्डन वीजा’ स्कीम 2020 में बंद कर दी गई थी। वजह- कथित रूप से आपराधिक आरोपों वाले, संदेहास्पद चरित्र वाले और पॉलिटिकली एक्सपोज्ड पर्सन (PEPs) ने साइप्रस का पासपोर्ट हासिल कर लिया था।
साइप्रस की नागरिकता लेने वालों में कई भारतीय आरोपी
अखबार की रिपोर्ट बताती है कि कुल 83 लोगों का पासपोर्ट रिवोक किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस लिस्ट में केवल एक भारतीय का नाम है- अनुभव अग्रवाल। अग्रवाल का नाम 3,600 करोड़ रुपये के नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (NSEL) घोटाले में आया था। उसे जून 2020 में दुबई से अरेस्ट किया गया। अग्रवाल इकलौते ऐसे भारतीय नहीं, जिन्होंने साइप्रस की नागरिकता ली मगर उनका कानून प्रवर्तन एजेंसियों से पाला पड़ चुका था। तमिलनाडु के कारोबारी MGM मारन का भी नाम है जिन्हें 2016 में नागरिकता मिली। मारन की कंपनी पर ईडी की जांच चल रही है। इसके अलावा, यूपी के कारोबारी विकर्ण अवस्थी और पत्नी रितिका अवस्थी का भी नाम है। अन्य प्रमुख भारतीयों में रियल एस्टेट डिवेलपर सुरेंद्र हीरानंदानी और उनका परिवार भी शामिल है।
क्या होता है गोल्डन पासपोर्ट
यह स्पेशल पासपोर्ट उन पासपोर्ट्स का दूसरा नाम है जो इन्वेस्टमेंट प्रोग्राम के जरिए नागरिकता लेने वालों को जारी किए जाते हैं। कुछ ही महीनों के भीतर इनवेस्टर्स और उनके परिवार को नागरिकता मिल जाती है। हाल के दिनों में रईसी का एक पैमाना यह भी है। ऐसे पासपोर्ट वे देश जारी करते हैं जिन्हें खूब पैसा चाहिए होता है। कई लोग दो-तीन देशों की नागरिकता लेकर रखते हैं। अगर उनके देश में कुछ गड़बड़ हो तो ऐसे पासपोर्ट भागने में काम आते हैं। चूंकि नागरिकता स्थायी होती है और भावी पीढ़ियों को भी मिलती है, इसलिए यह एक तरह से एसेट प्रोटेक्शन भी होता है।
