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‘रूस से कच्चा तेल खरीदना नहीं करेंगे बंद’, भारत का अमेरिका को क्लियर मैसेज

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नई दिल्ली,

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में बेतहाशा बढ़ोतरी की है. पहले जहां भारत के कुल क्रूड आयात में रूस की हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम थी, वहीं 2023 में इसका इराक और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक देशों के मुकाबले भारत के क्रुड आयात में सबसे ज्यादा 30 फीसदी हिस्सा रहा. बीते साल जुलाई में तो रूस से कुल क्रूड आयात का 40 फीसदी कच्चा तेल आयात किया गया था.

हालांकि इस साल फरवरी में रूस से होने वाला कच्चे तेल का आयात घटकर कुल आयात के करीब 25 फीसदी के बराबर हो गया था. ऐसे में कहा जाने लगा था कि अमेरिका के दबाव के सामने भारत ने रूस से क्रूड की खरीदारी कम कर दी है. लेकिन अब भारत सरकार ने इसे खारिज करते हुए साफ कहा है कि वो पहले की तरह ही रूस से कच्चे तेल को खरीदना जारी रखेगा. इस बारे में भारत सरकार ने अमेरिका को साफ तौर पर बता दिया गया है कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत को जरूरत के हिसाब से किसी भी देश से तेल की खरीदारी कर सकता है.

लाल सागर संकट बना अमेरिकी परेशानी का सबब
भारत ने हाल ही में साफ कर दिया था कि रूस से आयात घटने की वजह किसी तरह का दबाव नहीं है, बल्कि खरीदारी के पैटर्न में डायवर्सिफिकेशन के बाद बदलाव आया है. अब भारत क्रूड की खरीद के लिए चंद देशों पर निर्भर नहीं है. बीते कुछ साल में भारत ने कच्चा तेल खरीदने के लिए कई नई देशों से करार किया है. इसके बाद भारत 39 देशों से कच्चे तेल की खरीदारी कर रहा है.

यही वजह है कि अब भारत के कुल क्रूड आयात में किसी एक देश का दबदबा नहीं रह गया है. वहीं अमेरिका ने भी मौजूदा खाड़ी क्षेत्र और लाल सागर के हालात को देखते हुए अपना रुख बदल लिया है. अभी तक जहां अमेरिका की तरफ से भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने की बात कही जा रही थी वहीं अब US का कहना है कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए मना नहीं किया है.

अमेरिका ने कहा है कि अगर रूस से तेल खरीदकर भारत में रिफाइनिंग हो रही है तो फिर उसे रूस का क्रूड नहीं कहा जा सकता है. दरअसल, भारत रूस से जो कच्चा तेल खरीदता है उससे बने पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स को यूरोपीय देश खरीदते हैं. हालांकि अमेरिका की सोच ये भी है कि भारत रूस से बहुत ज्यादा मात्रा में क्रूड की खरीदारी नहीं करे और ये खरीद क्रूड की कीमतों को लेकर जारी अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत ही की जाए. जी-7 देशों ने रूस से तेल की खरीद का एक प्राइस बैंड तय किया हुआ है.

इसका मकसद है कि रूस को उसके तेल की कम कीमत मिले और दुनिया में भी तेल की ना तो कमी हो और ना ही इसके दाम बेकाबू होकर दुनियाभर में मंहगाई का तांडव मचा दें. भारत के दौरे पर आए अमेरिका के उपवित्त मंत्री एरिक वान नास्ट्रैंड ने साफ किया है कि रूसी कच्चे तेल की रिफाइनिंग के बाद बनाए गए प्रॉडक्ट्स पर ये प्रतिबंध लागू नहीं होते हैं. उन्होंने साफ किया है कि रूसी तेल रिफाइनिंग के बाद तकनीकी तौर पर रूस का तेल नहीं रह जाता है. यानी रिफाइनिंग के बाद रूसी क्रूड से बने प्रॉडक्ट्स को एक्सपोर्ट किए जाने पर इसे रूसी क्रूड का आयात नहीं माना जाएगा.

रूस से तेल खरीदने में सबसे आगे भारत!
अमेरिका के उपवित्त मंत्री एरिक वान नास्ट्रैंड ने ये तो साफ कर ही दिया है कि अमेरिका ने भारत से रूसी तेल इम्पोर्ट में कमी के लिए नहीं कहा है. लेकिन US का कहना है कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का लक्ष्य और जी7 की तय की गई 60 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा का मकसद रूस को क्रूड बेचकर मिलने वाले प्रॉफिट को सीमित करना है.

इसके साथ ही रूस से कच्चा तेल खरीदने पर प्रतिबंध इसलिए भी नहीं लगाया गया है क्योंकि ग्लोबल सप्लाई को भी बेअसर रखना है. फरवरी, 2022 में यूक्रेन पर रूस का हमला होने के बाद पश्चिमी देशों ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए थे. इनमें क्रूड की सीमित खरीदारी और प्राइस कैप लगाना भी शामिल था लेकिन इसके बाद से ही भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में टॉप पर रहा है.

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