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वाजपेयी की मौत से ठन गई, तब राजीव गांधी बने मसीहा… देश की राजनीति का स्वर्णिम अध्याय पढ़िए

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नई दिल्ली

टीवी न्यूज चैनल की डिबेट में नेताओं का जो हल्ला और आक्रमक तेवर आप देखते हैं, वह भारतीय राजनीति का चाल चरित्र कभी रहा ही नहीं।मौजूदा दौर की राजनीति में बहुत गिरावट है, विरोधी दल के नेता जानी दुश्मन की तरह एक-दूसरे के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करने से भी गुरेज नहीं करते। मगर नई पीढ़ी का जानना बेहत जरूरी है कि कुछ दशक पहले की राजनीति में अपने विरोधियों के प्रति द्वेष और बदले की भावना जैसा कुछ भी नहीं होता था। राजनीति के स्वर्णिम दौर की चर्चा आज हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 78वीं जयंती हैं और सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बता रहे हैं कि जब वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे। तब राजीव गांधी हमदर्द बनकर मदद के लिए आगे आए। आज दोनों ही पूर्व प्रधानमंत्री हमारे बीच नहीं है। मगर अटल जी का वह वीडियो जरूर है, जिसको आधार मानकर राजीतिक के गिरते स्तर को संभाला जा सकता है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बाजपेयी ने 1991 में कहा था, ‘अगर आज में जिंदा हूं तो राजीव गांधी की वजह से।’ इस बात से समझा जा सकता है कि उस समय की राजनीतिक कितनी स्वच्छ और साफ थी। राजनीतिक विरोधी होने के बाबजूद नेता एक दूसरे की मदद करते थे। मदद इस तरह की कि सामने वाले का आत्म सम्मान भी बना रहे। दरअसल 1991 से पहले वाजपेयी किडनी की समस्या से पीड़ित थे। तब भारत में इस बीमारी का इलाज संभव नहीं था। वाजपेयी को इलाज के लिए अमेरिका जाने की जरूरत थी। लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से वे अमेरिका नहीं जा पा रहे थे।

राजीव गांधी ने अटल से कहा आप मौके का फायदा उठा लीजिए
ये बात जब राजीव गांधी को पता चली तो उन्होंने तुरंत वाजपेयी को अपने दफ्तर बुलाया और कहा कि उन्हें वे संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं। उम्मीद है कि आप वहां जाकर मौके का फायदा उठाएंगे और अपना इलाज करवाएंगे।अटल का कहना था कि इसके बाद वे अमेरिका चले गए और अपना इलाज कराकर स्वस्थ्य होकर वापस लौटे।

ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।

राजीव गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री मोदी ने श्रद्धांजलि दी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 78वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1984-89 के दौरान पद संभाला था। यह आखिरी बार था जब कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत मिला था। 1991 में लिट्टे के आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की हत्या कर दी थी। मोदी ने कहा, ‘हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि।’

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