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अखिलेश 5 से आगे न बढ़ रहे, गठबंधन के आसरे नीतीश कुमार… फिर भी ‘UP + बिहार = गई मोदी सरकार’

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लखनऊ

उत्तर प्रदेश और बिहार मिल जाएं तो केंद्र में सरकार बनाई और बिगाड़ी जा सकती है। लेकिन कैसे? पोस्टर पॉलिटिक्स के जरिए उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमाने की कोशिश की गई है। पोस्टर में यूपी का जिक्र है। बिहार का जिक्र है। मोदी सरकार का जिक्र है। मोदी सरकार के जाने का जिक्र है। पोस्टर पर अखिलेश यादव है। नीतीश कुमार है। मतलब, मसाला भरपूर है। बस, एक ही चीज गायब है, वह हैं मुद्दे। चेहरों के सहारे और आसरे यूपी और बिहार की सियासत को साधने की कोशिश लगातार होती आई है। कई बार सफलता भी मिली है। लेकिन, चेहरे तो इधर भी हैं। आजमाए हुए हैं। फिर सवाल यह उठता है कि ‘यूपी + बिहार = गई मोदी सरकार’, कैसे? यह सही है कि अगर केंद्र सरकार से निपटना है तो एक चेहरे को लेकर माहौल अभी से बनाना होगा। लेकिन, क्या नीतीश कुमार चेहरा हैं? जवाब आपको नहीं मिलेगा। पोस्टर पर नीतीश कुमार और अखिलेश यादव को बराबर स्थान देकर बनवाने वाले कद में कोई कमजोर न दिखे, इसका भी ख्याल रखा है। इन तमाम परिस्थितियों और स्थितियों के बीच समझने की जरूरत है कि क्या देश या बिहार और उत्तर प्रदेश पोस्टरों एवं समीकरणों के सहारे बदलाव की राह पर बढ़ सकता है? जवाब यहां पर भी आपको नकारात्मक ही मिलेगा। एक- एक कर समीकरणों को खंगालते जाइए। उन मुद्दों को समझने की कोशिश कीजिए, जो लोकसभा चुनाव 2024 को प्रभावित कर सकते हैं, तो नारों के पीछे की हकीकत सामने आ जाएगी।

यूपी और बिहार की राजनीतिक जमीन अलग!
उत्तर प्रदेश और बिहार को कभी समाजवाद का गढ़ मानी जाती थी। खासकर मंडल आंदोलन के बाद से यूपी और बिहार से कांग्रेस का सफाया हो गया। क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीति चमकी। मुलायम सिंह यादव हों, मायावती, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार इसी मंडल की राजनीति के बाद उभरे ओबीसी-दलित वोट बैंक से निकले और सत्ता के शिखर तक पहुंचे। लेकिन, मंडल के साथ-साथ राम मंदिर आंदोलन को आधार बनाते हुए भारतीय जनता पार्टी हिंदी पट्‌टी में अपनी पकड़ मजबूत करती गई। मंडल की राजनीति के बीच से हिंदू वोट बैंक के उभार को हर राजनेता ने समझा, परखा। किसी न किसी काल में ये क्षेत्रीय क्षत्रप इसके साथ भी गए। मतलब, एक-दूसरे को मजबूत करने में भूमिका निभाई। तमाम शक्तियों को साथ लेने के बाद मजबूत हुई भाजपा ने वर्ष 2013 में गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी को अपने नेता के तौर पर पेश किया तो मंडल भी चरमराया और जातीय समीकरण भी दरकने लगे।

यूपी के राजनीतिक मैदान में नाटकीय अंदाज में एंट्री मार कर नरेंद्र मोदी ने खेल ही पलट दिया। नरेंद्र मोदी जब से यूपी के राजनीतिक मैदान में उतरे हैं। समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी, दोनों के लिए स्थिति अनुकूल नहीं रही है। बिहार में भी कमोबेश हालात ऐसे ही रहे हैं। 2014 से 2019 तक के लोकसभा चुनाव के काल को देखें तो भाजपा 43 फीसदी वोट शेयर से बढ़ते हुए 49 फीसदी तक पहुंच गई। सपा 28-29 फीसदी वोट शेयर से 22-23 फीसदी तक आई। बसपा से लेकर कांग्रेस तक का वोट शेयर घटा। बिहार में भी अगर राजनीतिक समीकरणों को देखें तो कुछ ऐसा ही देखने को मिलेगा।

वर्ष 2014 के चुनाव से पहले नीतीश कुमार भाजपा से नाता तोड़ चुके थे। अकेले चुनावी मैदान में उतरे थे। बिहार की 40 में से 30 सीटों पर भाजपा लड़ी और 22 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। 27 सीटों पर उतरने वाली राजद 4 सीटों पर सिमटी। कांग्रेस 12 सीटों पर लड़ी और 2 पर जीती। भाजपा के सहयोगी लोजपा को 6 और रालोसपा 3 सीटों पर जीती थी। जदयू इस चुनाव में सबसे अधिक 38 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरी थी। लेकिन, जीत केवल 2 सीटों पर मिल पाई।

2015 में बना नया इक्वेशन, बदला समीकरण
बिहार में 2015 में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव साथ आए और महागठबंधन ने बिहार में एनडीए की हवा निकाल दी। हालांकि, सबसे अधिक वोट भाजपा के खाते में गए थे। 243 सदस्यीय विधानसभा में राजद 81 सीटों के साथ पहले, जदयू 71 सीटों के साथ दूसरे और भाजपा 53 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही थी। जातीय समीकरण के महागठबंधन ने भाजपा के वोटों को काटा। हालांकि, 2 साल बाद 2017 में नीतीश कुमार एक बार फिर भाजपा के साथ थे। लोकसभा चुनाव का रण भाजपा और जदयू ने मिलकर लड़ा। 17 सीटों पर भाजपा, 16 सीटों पर जदयू और 6 सीटों पर लोजपा को जीत मिली। पिछले तीन चुनावों में जदयू तीन समीकरणों के साथ उतर चुकी है। बिहार चुनाव 2020 में भाजपा और जदयू साथ थे। लेकिन, इस चुनाव में राजद 75 सीटें जीतकर पहले नंबर पर, 74 सीटों के साथ भाजपा दूसरे नंबर पर और 43 सीटों के साथ जदयू तीसरे नंबर पर रहा।

तो क्या चौथे समीकरण की तलाश में अखिलेश?
अखिलेश यादव पिछले तीन चुनावों में तीन समीकरणों के साथ चुनावी मैदान में उतरे। वर्ष 2017 में दो लड़कों की जोड़ी चुनावी मैदान में थी। एक तरफ राहुल गांधी तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव। लोकसभा चुनाव 2014 के बाद बदलते यूपी के समीकरण को तब साधने के लिए अखिलेश के पोस्टर में राहुल गांधी साथ थे। चुनाव का रिजल्ट नहीं बदला। चुनाव के बाद दोनों युवाओं की जोड़ी जरूर टूट गई। 2019 में अखिलेश यादव ने बुआ मायावती के साथ गठबंधन किया। तब यूपी के राजनीतिक मैदान में पोस्टर पर अखिलेश और मायावती नजर आ रहे थे। कागज पर 55 फीसदी वोट शेयर का साथ दिखाकर यूपी से तब भी भाजपा की विदाई का दावा किया गया। लेकिन, पोस्टरों पर दिख रहा समीकरण राजनीतिक मैदान में जम नहीं पाया। 80 सीटों वाली यूपी में सपा-बसपा गठबंधन 15 सीटों के साथ अटक गई। यूपी चुनाव 2022 में ओबीसी वोट को साधने के लिए अखिलेश ने फिर समीकरण बदला। अबकी उनके पोस्टरों पर स्वामी प्रसाद मौर्य दिखे। ओम प्रकाश राजभर दिखे। कृष्णा पटेल दिखीं।

यूपी चुनाव 2012 में 224 सीटें जीतकर अपने दम पर सरकार बनाने वाली सपा आधी से एक कम यानी 111 सीटों पर ही सिमटी। वह भी तब जब यूपी के राजनीतिक मैदान में मायावती का जोर कमजोर था। कांग्रेस तो वैसे ही कुछ नारों के दम पर अपनी बात रखती दिख रही थी। अब नीतीश कुमार, अखिलेश यादव के साथ पोस्टर में आ गए हैं। लेकिन सवाल वहीं अटका है, बदला क्या?

मुद्दे बनाने में नाकाम हो रहे दल
वर्ष 2014 में राजनीतिक बदलाव से पहले भाजपा ने देश में मुद्दों को जनता के बीच पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसमें सबसे बड़ी भूमिका एक चेहरे की थी, जिन्हें चाहे, न चाहे पार्टी और गठबंधन का समर्थन हासिल था। वह थे नरेंद्र मोदी। उन्होंने महंगाई से लेकर महिला सुरक्षा तक के मुद्दे को जनता के बीच स्थापित किया। हिंदुत्व का मुद्दा तो सबसे आगे रहा ही। यह मुद्दा आज भी है। लेकिन, पोस्टर बनवाने वाले आईपी सिंह यूपी और बिहार में मुद्दों को उभारने को लेकर कोई बात करते नहीं दिख रहे हैं। अखिलेश यादव पिछले दो लोकसभा चुनाव से 5 सीटों से आगे नहीं बढ़ पा रहे। आजमगढ़ और रामपुर हारने के बाद संख्या तीन पर आ गई है। वहीं, नीतीश कुमार को राजद गठबंधन की आस है। अगर बिहार में नीतीश कुमार के डेडिकेटेड वोट बैंक की बात करें तो वह 8 फीसदी के आसपास है। और यह इतना ही है।

यह वोट बैंक जब एनडीए से जुड़ता है तो 31-32 फीसदी वोट शेयर के साथ मिलकर 40 फीसदी के आसपास पहुंचा देता है। महागठबंधन से जुड़ता है तो 33 फीसदी वोट शेयर के साथ मिलकर 41 फीसदी के आसपास ले जाता है। मतलब, बिहार में जीत के कैटलिस्ट नीतीश कुमार बनते हैं। अकेले जब लड़े तो 2 सीटों पर सिमटे। नालंदा और पूर्णिया। ऐसे में अखिलेश यादव के पोस्टर के साथ मुद्दे हों तो फिर जनता को इससे जोड़ने में अधिक मदद मिलेगी।

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