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मंदिर या फिर मस्जिद? ज्ञानवापी केस में हिंदू और मुस्लिम पक्ष की वे 10 दलीलें जो पूरा केस पलट देंगी

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वाराणसी

ज्ञानवापी मस्जिद मामले पर वाराणसी की जिला जज की अदालत में 26 मई से सुनवाई शुरू होने पर पहले 4 दिन मुस्लिम पक्ष और बाद में वादी हिंदू पक्ष की ओर से दलीलें पेश की गईं। इसके बाद दोनों पक्षों ने जवाबी बहस की और लिखित बहस भी दाखिल की। मुस्लिम पक्ष का कहना था कि ज्ञानवापी मस्जिद वक्‍फ की संपत्ति है। आजादी के पहले से वक्‍फ ऐक्‍ट में दर्ज है। इससे संबंधित दस्‍तावेज भी पेश किए गए। मस्जिद के संबंध में 1936 में दीन मोहम्‍मद केस में सिविल कोर्ट और 1942 में हाई कोर्ट के उस फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि यह मुकदमा सीपीसी ऑर्डर-7 रूल 11 के तहत सुनवाई योग्‍य नहीं है। उधर, हिंदू पक्ष की ओर से वक्‍फ संबंधी दस्‍तावेजों को फर्जी बताने के साथ कहा गया कि ज्ञानवापी में नीचे आदि विश्‍वेश्‍वर का मंदिर है। ऊपर का स्‍ट्रक्‍चर अलग है। जब तक किसी स्‍थल का धार्मिक स्‍वरूप तय नहीं हो जाता तब तक प्‍लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्‍ट-1991 प्रभावी नहीं माना जाएगा। जिला जज ने 24 अगस्‍त को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो आज सुनाया जाएगा।

ज्ञानवापी मस्जिद के पार्श्‍व भाग में स्थित श्रृंगार गौरी के नियमित दर्शन के साथ 1993 के पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग को लेकर नई दिल्‍ली निवासी राखी सिंह और वाराणसी की लक्ष्‍मी देवी, सीता शाहू, मंजू व्‍यास और रेखा पाठक की तरफ से सिविल जज की अदालत में वाद दाखिल दाखिल किया गया था। इस वाद की सुनवाई के दौरान बीते मई महीने में सिविल जज (सीनियर डिविजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत के आदेश पर पूरे ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे हुआ।

ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमिटी की ओर से सिविल जज के सर्वे कराने के आदेश को चुनौती दी गई। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद का दावा था कि 500 साल पुरानी मस्जिद देश की आजादी के दिन भी वहां थी। ऐसे में प्‍लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्‍ट 1991 के तहत सिविल जज का सर्वे करवाने का आदेश गलत है।

मंदिर के पक्ष में तर्क क्या हैं-
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जिसे सबसे मजबूत दलील के तौर पर देखा जा रहा है। उस टिप्पणी के बाद अब हिंदू पक्ष के लोगों को लग रहा है कि फैसला उनके हक में आएगा। उपासना स्थल पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यह कानून काशी और मथुरा में चल रहे मामलों पर कोई असर नहीं डालता है, वो मामले चलते रहेंगे और सुनवाई जारी रहेगी।
ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष के अनुसार जिस जगह पर प्राण प्रतिष्‍ठा होती है, वहां का स्‍वामित्‍व अनंत काल तक नहीं ब‍दलता। इस लिहाज से यह जमीन मस्जिद या फिर वक्‍फ की नहीं हो सकती है।
विवादित परिसर भूखंड का आराजी संख्‍या 9130 है, यहां पर पहले भी लगातार दर्शन पूजन होता रहा है। साल 1993 में बैरिकेडिंग बनाए जाने तक इस परिसर में हिंदू देवी देवताओं की पूजा होती रही है।
यह स्‍पष्‍ट किया कि जिनकी प्राण प्रतिष्‍ठा नहीं होती है, वह ज्‍योतिर्लिंग होते हैं। काशी विश्‍वनाथ ऐक्‍ट में पूरे के पूरे परिसर पर ही बाबा विश्‍वनाथ का स्‍वामित्‍व माना गया। ऐसे में ऐक्‍ट के खिलाफ जो भी फैसले जाने या अनजाने में हुए या लिए गए हैं, उन्हें शून्‍य माना गया है।
साल 1983 में हिंदू कानून में भगवान के प्रकार और अधिकार को लेकर स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या को अदालत में पेश किया गया है। इन तथ्‍यों के समर्थन में पुराने फैसलों की नजीर भी पेश की गई है।
कोर्ट में राम जानकी प्रकरण 1999 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के नजीर को भी सामने रखा। इसके अतिरिक्‍त अयोध्‍या प्रकरण को लेकर भी हिंदू पक्ष ने अदालत में दलील रखी थी।
हिंदू मत में पूजा के लिए मूर्ति की जरूरत नहीं है। हिंदू धर्म में समर्पण और निराकार ईश्‍वर की मान्‍यता के अनुसार पूजन की पुरानी मान्‍यता को झुठलाया नहीं जा सकता है।
ज्ञानवापी वक्‍फ सं‍पत्ति नहीं हो सकती है। वक्‍फ की संपत्ति का कोई मालिक होना चाहिए लेकिन इस मामले में संपत्ति हस्‍तांतरण का कोई आधार मौजूद नहीं है।
1937 के दीन मोहम्‍मद केस में भी 15 गवाहों ने पूजा अर्चना होने की पुष्टि की थी। ऐसे में यहां पर मंदिर की मान्‍यता आज के लिहाज से कोई नई बात नहीं जान पड़ती।
मंदिर को तोड़ने के बाद किस हिस्‍से में पूजा होती थी, उसका दस्‍तावेज भी इस समय उपलब्‍ध है। लिहाजा मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने और विध्‍वंस के बाद अशेष हिस्‍सों में हिंदू मतावलंबी पूजन करते रहे हैं।

मुस्लिमों की दलील भी जान लीजिए-
मुस्लिम पक्ष ने कहा कि श्रृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन करने की मांग के प्रार्थना पत्र की प्रकृति एक जनहित याचिका जैसी है। इसमें दर्शन- पूजन नियमित करने का अधिकार पूरे हिंदू समाज के लिए किया गया है। इसलिए किसी भी हाल में इसकी सुनवाई स्थानीय अदालत में नहीं हो सकती है।

अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी की ओर से बताया गया कि ज्ञानवापी मस्जिद वक्फ की संपत्ति है। वक्फ ऐक्ट के तहत इसकी सुनवाई सिविल अदालत में नहीं हो सकती है। लिहाजा वक्‍फ अदालत में ही इसकी सुनवाई की जाए।
दीन मोहम्मद बनाम भारत सरकार के 1936 के मुकदमे में अदालत ने ज्ञानवापी को मस्जिद माना है। उसमें नमाज का अधिकार मुस्लिम पक्ष को दिया है। उसी अनुरूप ही मस्जिद में नमाज और धार्मिक कार्य किए जा रहे थे।
दीन मोहम्मद केस में ज्ञानवापी आराजी संख्या 9130 के पैमाइश का बताया गया है। जमीन की पैमाइश 1 बीघा 9 बिस्वा 6 धुर मापी गई थी, जो आज भी ज्ञानवापी मस्जिद का ही हिस्‍सा है।
ज्ञानवापी मस्जिद में सैकड़ों सालों से नमाज लगातार होती आ रही है, इसलिए इस पर प्लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्ट 1991 लागू होता। इसके मुताबिक मुस्लिमों को वहां नमाज का अधिकार है। ऐसे में हिंदू पक्ष का यहां पर कोई हक नहीं बनता है।
मुगल शासक औरंगजेब ज्ञानवापी मस्जिद का मालिक था। निर्माण के समय भी उसका ही शासन था। उस समय की जो भी संपत्तियां थी, वह मुगल शासक औरंगजेब की ही थी। उसकी दी गई जमीन पर ही ज्ञानवापी मस्जिद बनी हुई है।
वक्फ की संपत्ति के लिए उसे हैंडओवर करने वाला कोई होना चाहिए। ज्ञानवापी मस्जिद के मामले में इसे वक्फ में दर्ज कराने के लिए जो दस्तावेज दिया गया था उसमें आलमगीर का नाम दर्ज है। मुगल शासक औरंगजेब का नाम आलमगीर है।
वाराणसी जिले के वक्फ कमिश्नर की रिपोर्ट पर ज्ञानवापी को वक्फ बोर्ड में दर्ज कराते हुए 1944 में प्रदेश शासन ने गजट किया था। ऐसे में सरकारी दस्‍तावेजों में भी ज्ञानवापी मस्जिद का अस्तित्‍व रहा है।
उत्तर प्रदेश शासन की ओर से जारी किए गए सरकारी गजट में भी ज्ञानवापी मस्जिद का वक्फ संख्या 100 दर्शाया गया है।
काशी विश्ननाथ मंदिर परिसर के विस्तार के लिए हिंदू पक्ष की ओर से जमीनों की अदला-बदली में भी ज्ञानवापी को मस्जिद के तौर पर ही स्वीकार किया गया है।

ज्ञानवापी स्थित श्रृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन और विग्रहों के संरक्षण को लेकर दायर वाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लंबी चली सुनवाई के बाद जिला जज डॉ. अजय कृष्‍ण विश्‍वेश की अदालत मेंटेनेबिलिटी यानी पोषणीयता पर फैसला सुनाएगी। जिला जज के फैसले पर सभी की नजरें हैं। फैसले से यह तय हो जाएगा कि देश की आजादी के दिन 15 अगस्‍त 1947 को ज्ञानवापी में मस्जिद थी या मंदिर और प्‍लेसेज ऑफ वर्शिप ऐक्‍ट 1991 लागू होगा या नहीं। फैसले का असर ज्ञानवापी से संबंधित निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट में लंबित कई मुकदमों पर भी पड़ेगा।

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